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7/17/26

एक बुजुर्ग की सीख: किसी की गलती का फैसला उसी दिन मत करना

 

एक बुजुर्ग 

जीवन की सबसे बड़ी सीख हमेशा किताबों से नहीं मिलती, कुछ बातें अनुभव सिखाता है। एक गाँव में एक बुजुर्ग अपने पोते के साथ रहते थे। उम्र के साथ उन्होंने दुनिया के अनेक रंग देखे थे। एक दिन उन्होंने अपने पोते को घर के पुराने संदूक की चाबी देते हुए कहा—

"बेटा, यह चाबी तो सिर्फ इस संदूक की है, लेकिन आज मैं तुम्हें जीवन की एक और चाबी दे रहा हूँ।"

7/10/26

सच्ची इबादत क्या है? | सेवा, कर्म और मानवता का वास्तविक अर्थ | प्रेरणादायक कहानी

 

सच्ची इबादत क्या है? – सेवा और कर्म का प्रेरणादायक संदेश

बहुत समय पहले एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय शासक रहते थे। वे नियमित रूप से प्रार्थना करते, लोगों की सहायता करते और ईश्वर के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। फिर भी उनके मन में एक प्रश्न था—क्या केवल पूजा-पाठ ही ईश्वर को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम मार्ग है?

एक दिन ध्यानावस्था में उन्होंने एक दिव्य दूत की कल्पना की, जिसके हाथ में एक विशाल पुस्तक थी। जिज्ञासावश उन्होंने पूछा,

"इस पुस्तक में क्या लिखा है?"

दूत ने उत्तर दिया,

"इसमें उन लोगों के नाम हैं जो ईश्वर की आराधना करते हैं।"

उन्होंने उत्सुकता से अपना नाम खोजने को कहा। पूरी पुस्तक देखने के बाद भी उनका नाम उसमें नहीं मिला। यह देखकर उन्हें आश्चर्य और निराशा दोनों हुई।

गुरु मूर्तिकार की तरह शिष्य को गढ़ता है: कवि दंडी की प्रेरक कथा और जीवन का अमूल्य संदेश

 मनुष्य के जीवन में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती, बल्कि सही मार्गदर्शन, अनुशासन और निरंतर आत्म-सुधार से प्राप्त होती है। इतिहास गवाह है कि हर महान व्यक्ति के पीछे किसी न किसी गुरु, मार्गदर्शक या शिक्षक का अमूल्य योगदान रहा है। एक सच्चा गुरु केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपने शिष्य के व्यक्तित्व को इस प्रकार तराशता है जैसे कोई कुशल मूर्तिकार साधारण पत्थर को अद्भुत प्रतिमा में बदल देता है।

प्राचीन भारतीय साहित्य में कवि दंडी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी प्रतिभा, साहित्यिक गहराई और भाषा पर असाधारण अधिकार उन्हें महान आचार्यों की श्रेणी में स्थापित करता है। किंतु उनकी सफलता केवल जन्मजात प्रतिभा का परिणाम नहीं थी। उसके पीछे कठोर अभ्यास, अनुशासन और उनके गुरु-पिता का दृढ़ मार्गदर्शन था। यही प्रसंग हमें यह समझाता है कि गुरु की कठोरता वास्तव में शिष्य के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला होती है।

क्या मृत्यु के बाद भी आत्मा जीवित रहती है? | प्रेतात्मा की गवाही की रहस्यमयी घटना

 

क्या मृत्यु के बाद भी जीवन समाप्त हो जाता है?

यह प्रश्न सदियों से मानव मन को आकर्षित करता आया है। विभिन्न धर्मों, आध्यात्मिक परंपराओं और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं में ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहाँ यह विश्वास व्यक्त किया गया है कि मृत्यु केवल शरीर का अंत है, चेतना का नहीं। आधुनिक विज्ञान इस विषय पर अभी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा है, फिर भी इतिहास और आध्यात्मिक साहित्य में अनेक रहस्यमयी घटनाओं का उल्लेख मिलता है।

ऐसी ही एक रोचक कथा इंग्लैंड में प्रचलित एक पुराने प्रसंग से जुड़ी है, जिसे कई आध्यात्मिक लेखकों ने अपने-अपने ढंग से वर्णित किया है। यह कहानी केवल रहस्य नहीं, बल्कि कर्तव्य, प्रेम और सत्य की शक्ति का भी संदेश देती है।

12/26/25

क्या स्त्री आज भी अन्नपूर्णा और गृहलक्ष्मी है?


हम अक्सर गर्व से कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में स्त्री को देवी का स्थान दिया गया है। उसे अन्नपूर्णा कहा गया, गृहलक्ष्मी कहा गया। ये शब्द सुनने में जितने सुंदर हैं, उतने ही भारी भी। क्योंकि इनके साथ अपेक्षाएँ जुड़ी हैं — ऐसी अपेक्षाएँ जो समय के साथ बदली नहीं, बल्कि और जटिल होती चली गईं।

12/2/25

करुणा का दीप: हरकचंद सावला की कहानी

करुणा का दीप: हरकचंद सावला की कहानी

मुंबई की सड़कों पर उस दिन बारिश थमी ही थी।
टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ भले सूखने लगे थे,
पर वहाँ बैठे लोगों के चेहरे अब भी किसी अंतहीन तूफ़ान में भीगे लग रहे थे।

करीब तीस वर्ष का एक युवक अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठे उन मरीजों को निहार रहा था—
वे मरीज, जिनके चेहरे पर दर्द की झुर्रियाँ और विवशता की लकीरें ऐसे गुथी थीं
मानो जीवन ने उन्हें अपने चरम क्रूर रूप से रुबरु करा दिया हो।

उनके साथ आए परिजन,
थके-हारे, डरे-सहमे,
कभी अस्पताल के बड़े दरवाज़े को देखते,
कभी आसमान की ओर नजर उठाते,
जैसे उम्मीद का एक छोटा-सा तिनका भी उन्हें संभाल लेगा।

अधिकांश लोग दूर-दराज़ के गांवों से आए थे।
न रहने की जगह, न भोजन का भरोसा।
दवा की कीमतें उनके लिए पहाड़ थीं,
और बीमारी—वह पहाड़ जिसे वे बिना रस्सी, बिना साधन,
सिर्फ उम्मीद के सहारे चढ़ रहे थे।

यह दृश्य उस युवक की आत्मा को झकझोर गया।
वह भारी मन से घर लौटा,
पर मन जैसे वहाँ से वापस आया ही नहीं।

रात की खामोशी में भी उसे
उन्हीं चेहरों की पीड़ा सुनाई देती रही।
सोच उन्हीं की घूमती रही—
“क्या मैं इन लोगों के लिए कुछ कर सकता हूँ?”
यह प्रश्न धीरे-धीरे उसके भीतर संकल्प बनकर जड़ पकड़ने लगा।

कई दिनों की बेचैनी के बाद उसे रास्ता दिखा।
अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा निकालकर उसने
अस्पताल के निकट एक छोटा-सा भवन लिया
और एक शांत, किन्तु विशाल कार्य की नींव रख दी—
जरूरतमंदों के लिए मुफ्त भोजन की सेवा।

शुरू में यह कार्य एक छोटी लौ की तरह था।
कुछ ही लोग भोजन लेने आते,
कुछ ही हाथ सहायता के लिए आगे बढ़ते।
पर प्रेम और करुणा का काम कब छोटा रहा है?
धीरे-धीरे लौ तेज हुई, और रोशनी फैलती गई।

दिन, महीने, वर्ष बीतते गए।
बारिश, गर्मी, सर्दी—
मौसम बदलते रहे,
पर उस सेवा की थाली कभी खाली नहीं हुई।

जिस युवक ने यह कार्य शुरू किया था,
आज वही मानवता की मिसाल बन चुका है—
हरकचंद सावला।

भोजन सेवा के बाद उन्होंने देखा कि कई मरीज दवा खरीदने में असमर्थ हैं।
और तब उन्होंने शुरू किया—
मेडिसिन बैंक,
जहाँ डॉक्टर और फार्मासिस्ट स्वेच्छा से सेवा देने लगे।

कैंसर से जूझते बच्चों की आँखों से मासूम चमक न खो जाए,
इसके लिए उन्होंने टॉय बैंक भी बनाया—
एक छोटी-सी मुस्कान देने का प्रयास,
जो शायद किसी बच्चे को दर्द भुला दे।

धीरे-धीरे सावला के नेतृत्व में
जीवन ज्योत कैंसर रिलीफ एंड केयर ट्रस्ट
मानवीयता की एक विस्तृत छतरी बन गया—
भोजन, दवा सहायता, रक्त सहयोग,
काउंसलिंग और आर्थिक सहायता जैसे अनेक कार्यों के साथ।

सत्तर की दहलीज पार करने के बावजूद
हरकचंद सावला का उत्साह आज भी वैसा ही है
जैसा उस पहले दिन था,
जब उन्होंने अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठे मरीजों को देखा था।

पुरस्कार, पहचान, प्रसिद्धि—
उनकी यात्रा में ये सब कभी लक्ष्य नहीं रहे।
उन्होंने हमेशा कहा—
“सच्ची सेवा वह है, जिसे करने वाला खुद भूल जाए,
पर जिसका असर दुनिया याद रखे।”

आज जब हम समाज के चमकते चेहरों की ओर देखते हैं,
तो यह भी याद रखना चाहिए कि
असल रोशनी अक्सर उन लोगों के भीतर छिपी होती है
जो बिना शोर किए,
बिना मंचों की रोशनी के,
किसी अजनबी के जीवन में आशा का दीप जलाते हैं।

हरकचंद सावला उसी दीप का नाम है—
जो अब भी टिमटिमाता नहीं,
बल्कि स्थिर, अडिग और उज्ज्वल होकर
हजारों जीवनों को रोशन कर रहा है।


7/4/25

अल्बर्ट आइंस्टाइन | 4 साल तक नहीं बोले दुनिया के Genius! विज्ञान, प्यार और पछतावे की अनसुनी दास्तान

आज हम बात करेंगे उस महान वैज्ञानिक की, जिसने पूरी दुनिया की सोच बदल दी।

यह कहानी है अल्बर्ट आइंस्टाइन की – विज्ञान के जीनियस की, जिसके दिमाग में ब्रह्मांड के रहस्य थे, लेकिन जिसका दिल प्यार और पछतावे की उलझनों से भरा था।

आज हम उसकी अनसुनी दास्तान सुनेंगे – जिसमें विज्ञान है, प्यार है, जिद है, दूरियां हैं और गहरा पछतावा भी।

शुरुआत – जन्म और बचपन

अल्बर्ट आइंस्टाइन का जन्म चौदह मार्च अठारह सौ उन्यासी को जर्मनी के उल्म नामक शहर में हुआ। उनके पिता हरमन आइंस्टाइन एक मझोले इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और मां पौलीन एक पढ़ी-लिखी, संगीतप्रेमी महिला थीं।

5/22/25

"चार्ली चैपलिन का ऐतिहासिक भाषण | Charlie Chaplin's historical speech The Great Dictator Explained in Hindi"

"चार्ली चैपलिन का ऐतिहासिक भाषण | इंसानियत, आज़ादी और उम्मीद की सबसे ताक़तवर आवाज़ | The Great Dictator Explained in Hindi"

नमस्कार दोस्तों,

आज मैं आपसे एक ऐसी बात साझा करना चाहता हूँ, जो सीधे दिल से निकलती है —
यह एक आवाज़ है इंसानियत की… एक पुकार है आज़ादी की।
ये शब्द हैं — चार्ली चैपलिन की फ़िल्म The Great Dictator के अंतिम भाषण से,

मुझे सम्राट नहीं बनना… मुझे सत्ता नहीं चाहिए।
मैं किसी पर राज नहीं करना चाहता, किसी को कुचलना नहीं चाहता।
अगर मैं कुछ चाहता हूँ…
तो बस सबकी मदद करना —

यहूदी हो या गैर-यहूदी, गोरे हों या काले — हम सब इंसान हैं… एक जैसे।
हम सब एक-दूसरे की मदद करना चाहते हैं, क्योंकि हम ऐसे ही बने हैं।
हम एक-दूसरे की खुशियों में जीना चाहते हैं — दुःखों में नहीं।

इस धरती पर हर किसी के लिए जगह है,
ये धरती इतनी समृद्ध है कि सभी की ज़रूरतें पूरी कर सकती है।
लेकिन अफ़सोस… हमने रास्ता भटका दिया है।
लालच ने हमारी आत्मा को जहर से भर दिया है…
नफ़रत की दीवारें खड़ी हो गई हैं।

हम मशीनों से घिर गए हैं,
लेकिन हमें इंसानियत चाहिए।
हमारे पास विज्ञान है… लेकिन समझ नहीं।
हमारे पास बुद्धि है… लेकिन करुणा नहीं।

हम बहुत सोचते हैं… लेकिन बहुत कम महसूस करते हैं।

साथियों!

हमें फिर से इंसान बनना होगा। हमें दया चाहिए, भाईचारा चाहिए।
हमें एक ऐसी दुनिया बनानी है जहाँ हर इंसान को काम मिले, हर बुज़ुर्ग को सुरक्षा मिले, और हर बच्चा मुस्कुरा सके।

सैनिकों!

बंदूकें उठाने वालों! तानाशाहों के लिए मत लड़ो! वो तुमसे नफ़रत करते हैं, तुम्हें गुलाम बनाते हैं, तुम्हारे दिमाग को कंट्रोल करते हैं…
तुम्हारा जीवन चुरा लेते हैं।

मत बनो उनकी मशीनें। तुम इंसान हो!

तुम्हारे दिलों में इंसानियत है —
प्यार है, करुणा है। नफरत से नहीं, प्यार से जीने का वक्त आ गया है।

हमें मिलकर एक नई दुनिया बनानी है, जहाँ लोकतंत्र हो, आज़ादी हो, सम्मान हो।
और यही समय है — जब हम सब एक होकर कहें:

नफ़रत नहीं चाहिए — इंसानियत चाहिए। तानाशाह नहीं चाहिए — बराबरी चाहिए। डर नहीं चाहिए — आज़ादी चाहिए।

धन्यवाद!


"आइए हम सब मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाएं, जहाँ हम फिर से इंसान कहलाने लायक बन सकें।

2/10/25

क्या आप जानते हैं कि भोजन करना भी एक शानदार कला है? Do you know that eating is also a wonderful art?

 

किसी कार्य का तरीका महत्वपूर्ण है, लेकिन भोजन चबाने के तरीके पर लंबे समय तक सवाल नहीं उठाए गए। हाल में इस पर ध्यान दिया गया है, जबकि भोजन के गुणों पर चर्चा करने वालों ने भी इसे नजरअंदाज किया। जैसे इंजन में ईंधन डालना एक विशेष कार्य है, जिसे सही तरीके से करना जरूरी है, अन्यथा इंजन ठीक से काम नहीं करेगा। इसी तरह, पेट भरने के लिए यह समझना आवश्यक है कि कौन सी खाद्य सामग्री कितनी मात्रा में और किस प्रकार से खानी चाहिए, ताकि शरीर को अधिकतम लाभ मिल सके।

1/22/20

अनोखी परीक्षा - मेरी पारिवारिक भूमिका


"बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।" लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये।

"देख मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"

3/22/16

या ईश्वर को छोड़ दो... या ईश्वर के ऊपर छोड़ दो....






एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट था|


नाम था मार्क,


एक बार किसी सम्मेलन में


भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे।


वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य  के लिए पुरुस्कृत किया जाना था।


वे बड़े उत्साहित थे,


व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी।




बड़ा उतावलापन था,


उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।








जहाज उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई,




जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।


डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे,





इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए।


उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है।


टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।




जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया।


रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए।


लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे,


भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे।


कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।





झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी।


परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।




एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला।


डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है।


फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए।


मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर,


आगे चले जाना।








भूखे,


भीगे


और


थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी।





उस औरत ने उन्हें बिठाया,


बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया।


साथ ही उसने कहा, "आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें


और उनका धन्यवाद कर दें।"





डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,




"मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता।


मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं।


आप अपनी प्रार्थना कर लें।"





टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी।


उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो,


इस स्त्री को कुछ समस्या है।




जैसे ही वह औरत


अपने पूजा के स्थान से उठी,


तो डाक्टर ने पूछा,




"आपको भगवान से क्या चाहिेए?


क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?"





उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,




"ये मेरा लड़का है


और इसको कैंसर रोग है


जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है


परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं


कि मैं उन तक,


उनके शहर जा सकूं


क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं।




यह सच है की कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है


कि भगवान एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे।


वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे।


वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।





डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए।


वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए।


आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,


"भगवान बहुत महान हैं।"





(उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था।


कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।


कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)





वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था




बल्कि भगवान उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे


कि वे भौतिक जीवन में


धन कमाने,


प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि


से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें।


    


वे समझ गए की भगवान चाहते हैं


कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है


किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है।


         




हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है


की जो हो रहा है,


उस पर उसका कण्ट्रोल है


और वह इन्सान ही


सब कुछ कर रहा है ।




पर अचानक ही कोई


अनजानी ताकत सबकुछ बदल देती है


कुछ ही सेकण्ड्स लगते हैं


सबकुछ बदल जाने में


फिर हम याद करते हैं


परमपिता परमात्मा  को।









या ईश्वर को छोड़ दो...


             या ईश्वर के ऊपर छोड़ दो....



2/18/16

बहुत सरल है भगवान् का दोस्त बनना....

एक बच्चा गला देनेवाली सर्दी में नंगे पैर प्लास्टिक के तिरंगे बेच रहा था,

लोग उसमे भी मोलभाव कर रहे थे।

एक सज्जन को उसके पैर देखकर बहुत दुःख हुआ, सज्जन ने बाज़ार से नया जूता ख़रीदा और उसे देते हुए कहा

"बेटा लो, ये जूता पहन लो".

लड़के ने फ़ौरन जूते निकाले और पहन लिए,

उसका चेहरा ख़ुशी से दमक उठा था. वो उस सज्जन की तरफ़ पल्टा और हाथ थाम कर पूछा

"आप भगवान हैं ?

उसने घबरा कर हाथ छुड़ाया और कानों को हाथ लगा कर कहा

"नहीं बेटा, नहीं. मैं भगवान नहीं"

लड़का फिर मुस्कराया और कहा

"तो फिर ज़रूर भगवान के दोस्त होंगे,

क्योंकि मैंने कल रात भगवान से कहा था कि मुझे नऐ जूते देदें,"

वो सज्जन मुस्कुरा दिया और उसके माथे को प्यार से चूमकर अपने घर की तरफ़ चल पड़ा.


अब वो सज्जन भी जान चुके थे कि भगवान का दोस्त होना कोई मुश्किल काम नहीं....


Source - Facebook


1/25/16

कोई_अपना_सा.....


बाजार से घर लौटते वक्त कुछ खाने का मन

किया तो,

वह रास्ते में खड़े ठेले वाले के पास भेलपूरी

लेने के लिए रूक गयी।..

उसे अकेली खड़ी देख, पास ही बनी पान की

दुकान पर खड़े कुछ मनचले भी वहाँ आ

गये।...

घूरती आँखे लड़की को असहज कर रही थी,

पर वह ठेले वाले को पहले पैसे देचुकी थी,

इसलिए मन कड़ा करके खड़ी रही।

द्विअर्थी गानों के बोल के साथ साथ आँखो में

लगी अदृश्य दूरबीन से सब लड़के उसकी

शारीरीक सरंचना का निरिक्षण कर रहे थे।...

उकताकर वह कभी दुपट्टे को सही करती तो

कभी ठेले वाले से और जल्दी करने को कहती।


मनचलों की जुगलबंदी चल ही रही थी कि

कबाब में हड्डी की तरह एक बाईक सवार

युवक वँहा आकर रूका।..

"अरे पूनम...तू यहाँ क्या कर रही है ? हम्म..!

अपने भाई से छुपकर पेट पूजा हो रही है।"

बाईक सवार युवक ने लड़की से कहा।..

संभावित खतरे को भाँपकर मनचले तुरंत इधर

उधर खिसक लिये।..

समस्या से मिले अनपेक्षित समाधान से

लड़की ने राहत की साँस ली


फिर असमंजस भरे भाव के साथ युवक से कहा

" माफ किजिए, मेरा नाम एकता है। आपको

शायद गलतफहमी हुई है, मैं आपकी बहन नही

हूँ।"

.."मैं जानता हूँ...! मगर किसी की तो बहन हो.."

कहकर युवक ने मुस्कुराते हुए हेलमेट पहना

ओर अपने रास्ते चल दिया।


दोस्तों हर कोई तो नही सुधर सकता इसलिये

बस इतना ही कहना है की खुद को उस बाइक

वाले व्यक्ति की तरह बनाओ ना की पान वालो

की तरह 

अगर पसन्द आई हो तो शेयर करना ना

भूले क्या पता किसी की सोच बदल जाएँ।


Source - Facebook


1/15/16

एक चुटकी ज़हर रोजाना

आरती नामक एक युवती का विवाह हुआ और वह अपने पति और सास के साथ अपने ससुराल में रहने लगी। कुछ ही दिनों बाद आरती को आभास होने लगा कि उसकी सास के साथ पटरी नहीं बैठ रही है। सास पुराने ख़यालों की थी और बहू नए विचारों वाली।

आरती और उसकी सास का आये दिन झगडा होने लगा।

दिन बीते, महीने बीते. साल भी बीत गया. न तो सास टीका-टिप्पणी करना छोड़ती और न आरती जवाब देना। हालात बद से बदतर होने लगे। आरती को अब अपनी सास से पूरी तरह नफरत हो चुकी थी. आरती के लिए उस समय स्थिति और बुरी हो जाती जब उसे भारतीय परम्पराओं के अनुसार दूसरों के सामने अपनी सास को सम्मान देना पड़ता। अब वह किसी भी तरह सास से छुटकारा पाने की सोचने लगी.

एक दिन जब आरती का अपनी सास से झगडा हुआ और पति भी अपनी माँ का पक्ष लेने लगा तो वह नाराज़ होकर मायके चली आई।

आरती के पिता आयुर्वेद के डॉक्टर थे. उसने रो-रो कर अपनी व्यथा पिता को सुनाई और बोली – “आप मुझे कोई जहरीली दवा दे दीजिये जो मैं जाकर उस बुढ़िया को पिला दूँ नहीं तो मैं अब ससुराल नहीं जाऊँगी…”

बेटी का दुःख समझते हुए पिता ने आरती के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा – “बेटी, अगर तुम अपनी सास को ज़हर खिला कर मार दोगी तो तुम्हें पुलिस पकड़ ले जाएगी और साथ ही मुझे भी क्योंकि वो ज़हर मैं तुम्हें दूंगा. इसलिए ऐसा करना ठीक नहीं होगा.”

लेकिन आरती जिद पर अड़ गई – “आपको मुझे ज़हर देना ही होगा ….

अब मैं किसी भी कीमत पर उसका मुँह देखना नहीं चाहती !”

कुछ सोचकर पिता बोले – “ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी। लेकिन मैं तुम्हें जेल जाते हुए भी नहीं देख सकता इसलिए जैसे मैं कहूँ वैसे तुम्हें करना होगा ! मंजूर हो तो बोलो ?”

“क्या करना होगा ?”, आरती ने पूछा.

पिता ने एक पुडिया में ज़हर का पाउडर बाँधकर आरती के हाथ में देते हुए कहा – “तुम्हें इस पुडिया में से सिर्फ एक चुटकी ज़हर रोज़ अपनी सास के भोजन में मिलाना है।

कम मात्रा होने से वह एकदम से नहीं मरेगी बल्कि धीरे-धीरे आंतरिक रूप से कमजोर होकर 5 से 6 महीनों में मर जाएगी. लोग समझेंगे कि वह स्वाभाविक मौत मर गई.”

पिता ने आगे कहा -“लेकिन तुम्हें बेहद सावधान रहना होगा ताकि तुम्हारे पति को बिलकुल भी शक न होने पाए वरना हम दोनों को जेल जाना पड़ेगा ! इसके लिए तुम आज के बाद अपनी सास से बिलकुल भी झगडा नहीं करोगी बल्कि उसकी सेवा करोगी।

यदि वह तुम पर कोई टीका टिप्पणी करती है तो तुम चुपचाप सुन लोगी, बिलकुल भी प्रत्युत्तर नहीं दोगी ! बोलो कर पाओगी ये सब ?”

आरती ने सोचा, छ: महीनों की ही तो बात है, फिर तो छुटकारा मिल ही जाएगा. उसने पिता की बात मान ली और ज़हर की पुडिया लेकर ससुराल चली आई.

ससुराल आते ही अगले ही दिन से आरती ने सास के भोजन में एक चुटकी ज़हर रोजाना मिलाना शुरू कर दिया।

साथ ही उसके प्रति अपना बर्ताव भी बदल लिया. अब वह सास के किसी भी ताने का जवाब नहीं देती बल्कि क्रोध को पीकर मुस्कुराते हुए सुन लेती।

रोज़ उसके पैर दबाती और उसकी हर बात का ख़याल रखती।

सास से पूछ-पूछ कर उसकी पसंद का खाना बनाती, उसकी हर आज्ञा का पालन करती।

#राजेशकान्धवे

कुछ हफ्ते बीतते बीतते सास के स्वभाव में भी परिवर्तन आना शुरू हो गया. बहू की ओर से अपने तानों का प्रत्युत्तर न पाकर उसके ताने अब कम हो चले थे बल्कि वह कभी कभी बहू की सेवा के बदले आशीष भी देने लगी थी।

धीरे-धीरे चार महीने बीत गए. आरती नियमित रूप से सास को रोज़ एक चुटकी ज़हर देती आ रही थी।

किन्तु उस घर का माहौल अब एकदम से बदल चुका था. सास बहू का झगडा पुरानी बात हो चुकी थी. पहले जो सास आरती को गालियाँ देते नहीं थकती थी, अब वही आस-पड़ोस वालों के आगे आरती की तारीफों के पुल बाँधने लगी थी।

बहू को साथ बिठाकर खाना खिलाती और सोने से पहले भी जब तक बहू से चार प्यार भरी बातें न कर ले, उसे नींद नही आती थी।

छठा महीना आते आते आरती को लगने लगा कि उसकी सास उसे बिलकुल अपनी बेटी की तरह मानने लगी हैं। उसे भी अपनी सास में माँ की छवि नज़र आने लगी थी।

जब वह सोचती कि उसके दिए ज़हर से उसकी सास कुछ ही दिनों में मर जाएगी तो वह परेशान हो जाती थी।

इसी ऊहापोह में एक दिन वह अपने पिता के घर दोबारा जा पहुंची और बोली – “पिताजी, मुझे उस ज़हर के असर को ख़त्म करने की दवा दीजिये क्योंकि अब मैं अपनी सास को मारना नहीं चाहती … !

वो बहुत अच्छी हैं और अब मैं उन्हें अपनी माँ की तरह चाहने लगी हूँ!”

पिता ठठाकर हँस पड़े और बोले – “ज़हर ? कैसा ज़हर ? मैंने तो तुम्हें ज़हर के नाम पर हाजमे का चूर्ण दिया था … हा हा हा !!!”

"बेटी को सही रास्ता दिखाये,

माँ बाप का पूर्ण फर्ज अदा करे"


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10/10/15

पहली बार मुझे मेरी ईमानदारी का इनाम मिला था !!......




इस साल मेरा सात वर्षीय बेटा दूसरी कक्षा मैं प्रवेश पा गया!! क्लास मैं हमेशा से अव्वल आता रहा है!





पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो…  मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाज़ार ले गया !

बेटे ने जूते लेने से ये कह कर मना कर दिया की पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरुरत है

वो अभी इस साल काम दे सकते हैं!




अपने जूतों की बजाये उसने मुझे अपने दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा !

मैंने सोचा बेटा अपने दादा से शायद बहुत प्यार करता है इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा

जरूरी समझ रहा है ! खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा…..


दुकानदार ने बेटे के साइज़ की सफ़ेद शर्ट निकाली … डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी….. फिर भी बेटे ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा !!!!




मैंने बेटे से कहा : बेटा ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है तो फिर और लम्बी क्यों ?

बेटे ने कहा :पिता जी मुझे शर्ट निक्कर के अंदर ही डालनी होती है इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा……. लेकिन यही शर्ट मुझे अगली क्लास में भी काम आ जाएगी ……

पिछली वाली शर्ट भी अभी नयी जैसी ही पड़ी है लेकिन छोटी होने की वजह से मैं उसे पहन नहीं पा रहा !

मैं खामोश रहा !!

घर आते वक़्त मैंने बेटे से पूछा : तुम्हे ये सब बातें कौन सिखाता है बेटा ?

बेटे ने कहा: पिता जी मैं अक्सर देखता था कि कभी माँ अपनी साडी छोड़कर तो कभी आप अपने जूतों को छोडकर हमेशा मेरी किताबों और कपड़ो पैर पैसे खर्च कर दिया करते हैं !

गली- मोहल्ले में सब लोग कहते हैं के आप बहुत ईमानदार आदमी हैं!

और हमारे साथ वाले राजू के पापा को सब लोग चोर, कुत्ता, बे-ईमान, रिश्वतखोर और जाने क्या क्या कहते हैं,

जबकि आप दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं…..

जब सब लोग आपकी तारीफ करते हैं तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है…..

मम्मी और दादा जी भी आपकी तारीफ करते हैं ! पिता जी मैं चाहता हूँ कि….

मुझे कभी जीवन में नए कपडे, नए जूते मिले या न मिले

लेकिन कोई आपको चोर, बे-ईमान, रिश्वतखोर या कुत्ता न कहे !!!!!

मैं आपकी ताक़त बनना चाहता हूँ पिता जी, आपकी कमजोरी नहीं !

बेटे की बात सुनकर मैं निरुतर था! आज मुझे पहली बार मुझे मेरी ईमानदारी का इनाम मिला था !!

आज बहुत दिनों बाद आँखों में ख़ुशी, गर्व और सम्मान के आंसू थे…!!


9/29/15

संतरे बेचती बूढ़ी औरत.....








एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे खरीदता ।





अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता, "ये कम मीठा लग रहा है, देखो !" बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!"





वो उस संतरे को वही छोड़, बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता।





युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा "ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?"





युवा ने पत्नी को एक मघुर मुस्कान के साथ बताया "वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती, इस तरह उसे मै संतरे खिला देता हूँ ।





एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया, ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है, पर संतरे तौलते मै तेरे पलड़े देखती हूँ, तू हमेशा उसकी चख चख में, उसे जादा संतरे तौल देती है ।





बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा "उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर होती है, वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम देखती हूँ, पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।





SOURCE - FACEBOOK


7/22/15

जीवन” का नवीन अर्थ - पिज्जा


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भूले


--------------------पिज्जा------------------------





पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…




पति- क्यों??

उसने कहा..- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…

पति- क्यों??

पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…

पति- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…

पत्नी- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस..

पति- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…

पत्नी- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!

पति- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…

पत्नी- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाहपाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…

पति- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??

तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...

पति- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?

बाई- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..

पति- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?

बाई- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में 500 रूपए खर्च कर दिए…

पति- अच्छा!! मतलब क्या किया 500 रूपए का??



बाई- नाती के लिए 150 रूपए का शर्ट, 40 रूपए की गुड़िया, बेटी को 50 रूपए के पेढे लिए, 50 रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, 60 रूपए किराए के लग गए.. 25 रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए 50 रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए 75 रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…



पति- 500 रूपए में इतना कुछ???



वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटाकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे… “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए

जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया…



Source - facebook


7/19/15

''आपके हिसाब से इस गिलास का वज़न कितना होगा?''....

















एक प्रोफ़ेसर ने अपने हाथ में पानी से भरा एक गिलास पकड़ते हुए अध्यापन शुरू किया ।

उन्होंने उसे ऊपर उठा कर सभी छात्रों को दिखाया और पूछा ,

''आपके हिसाब से इस गिलास का वज़न कितना होगा?''



50 ग्राम….

100 ग्राम…

125 ग्राम'…

छात्रों ने उत्तर दिया ।


जब तक मैं इसका वज़न ना कर लूँ

मुझे इसका सही वज़न नहीं बता सकता.

प्रोफ़ेसर ने कहा. ”पर मेरा सवाल है,

यदि मैं इस ग्लास को थोड़ी देर तक इसी तरह उठा कर पकडे रहूँ तो क्या होगा ?


‘कुछ नहीं’ …छात्रों ने कहा.


‘अच्छा , अगर मैं इसे मैं इसी तरह एक घंटे तक उठाये रहूँ तो क्या होगा ?' ,


प्रोफ़ेसर ने पूछा.


‘आपका हाथ दर्द करने लगेगा’,

एक छात्र ने कहा.


'तुम सही कह रहे हो,

अच्छा अगर मैं इसे इसी तरह पूरे दिन उठाये रहूँ तो का होगा?'


”आपका हाथ सुन्न हो सकता है,

आपके मांसपेशियों में भारी तनाव आ सकता है,

लकवा मार सकता है

और पक्का आपको अस्पताल जाना पड़ सकता है”…

.किसी छात्र ने कहा,

और बाकी सभी हंस पड़े…


“बहुत अच्छा ,

पर क्या इस दौरान गिलास


का वज़न बदला?”


प्रोफ़ेसर ने पूछा.


उत्तर आया


..”नहीं”


”तब भला हाथ में दर्द और मांशपेशियों में तनाव क्यों आया?”


छात्र अचरज में पड़ गए.


फिर प्रोफ़ेसर ने पूछा


” अब दर्द से निजात पाने के लिए मैं क्या करूँ?”


”ग्लास को नीचे रख दीजिये!

एक छात्र ने कहा.

”बिलकुल सही!”

प्रोफ़ेसर ने कहा.

जीवन की समस्याएं भी कुछ इसी तरह

होती हैं.


इन्हें कुछ देर तक अपने दिमाग में

रखिये

और लगेगा की सब कुछ ठीक है

उनके बारे में ज्यदा देर सोचिये

और आपको पीड़ा होने लगेगी.

और इन्हें और भी देर तक अपने दिमाग में रखिये

और ये आपको लकवाग्रस्त करने लगेंगी.

और आप कुछ नहीं कर पायेंगे.


अपने जीवन में आने

वाली चुनातियों और समस्याओं के बारे में सोचना ज़रूरी है,

पर उससे भी ज्यादा ज़रूरी है

दिन के अंत में सोने जाने से पहले उन्हें नीचे रखना.

इस तरह से, आप तनावग्रस्त नहीं रहेंगे,

आप हर रोज़ मजबूती और ताजगी के साथ उठेंगे और सामने आने

वाली किसी भी चुनौती का सामना कर सकेंगे .....।


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7/5/15









माँ ने एक शाम दिनभर की लम्बी थकान एवं काम के बाद जब डिनर बनाया तो उन्होंने पापा के सामने एक प्लेट सब्जी और एक जली हुई रोटी परोसी।





मूझे लग रहा था कि इस जली हुई रोटी पर पापा कुछ कहेंगे, परन्तु पापा ने उस रोटी को आराम से खा लिया।





हालांकि मैंने माँ को पापा से उस जली रोटी के लिए "साॅरी" बोलते हुए जरूर सुना था।





और मैं ये कभी नहीं भूल सकता जो पापा ने कहा: "मूझे जली हुई कड़क रोटी बेहद पसंद हैं।"





देर रात को मैंने पापा से पूछा, क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद हैं?





उन्होंने कहा- "तुम्हारी माँ ने आज दिनभर ढ़ेर सारा काम किया, ओर वो सचमुच बहुत थकी हुई थी।





और वैसे भी एक जली रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती परन्तु कठोर-कटू शब्द जरूर पहुंचाते हैं।





तुम्हें पता है बेटा - "जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से...अपूर्ण लोगों से... कमियों से...दोषों से...





मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूँ , और शायद ही किसी काम में ठीक हूँ।





मैंने इतने सालों में सीखा है कि "एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करना... 


नजरंदाज करना... 


आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना।"





मित्रों, जिदंगी बहुत छोटी है...


उसे हर सुबह-शाम दु:ख...पछतावे...


खेद में बर्बाद न करें।





जो लोग तुमसे अच्छा व्यवहार करते हैं, उन्हें प्यार करें और जो नहीं करते उनके लिए दया, सहानुभूति रखें।


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