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7/17/26

एक बुजुर्ग की सीख: किसी की गलती का फैसला उसी दिन मत करना

 

एक बुजुर्ग 

जीवन की सबसे बड़ी सीख हमेशा किताबों से नहीं मिलती, कुछ बातें अनुभव सिखाता है। एक गाँव में एक बुजुर्ग अपने पोते के साथ रहते थे। उम्र के साथ उन्होंने दुनिया के अनेक रंग देखे थे। एक दिन उन्होंने अपने पोते को घर के पुराने संदूक की चाबी देते हुए कहा—

"बेटा, यह चाबी तो सिर्फ इस संदूक की है, लेकिन आज मैं तुम्हें जीवन की एक और चाबी दे रहा हूँ।"

पोते ने उत्सुकता से पूछा, "वह कौन-सी, दादाजी?"

बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, "किसी की गलती का फैसला उसी दिन कभी मत करना। पहले एक रात गुजरने देना, फिर निर्णय लेना।"

पोते को यह बात कुछ अजीब लगी, लेकिन उसने इसे अपने मन में बैठा लिया।

कुछ दिनों बाद उसका सबसे अच्छा मित्र पूरे दिन उसके फोन का जवाब नहीं दे रहा था। उसे लगा कि शायद मित्र अब उससे नाराज़ है। गुस्से में उसने तय कर लिया कि अब वह भी कभी उससे बात नहीं करेगा। तभी उसे दादाजी की बात याद आई। उसने एक दिन रुकने का फैसला किया।

अगली सुबह मित्र का फोन आया। उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी। उसने बताया कि रात भर वह अपनी माँ को अस्पताल में भर्ती कराने में लगा था, इसलिए किसी का फोन नहीं उठा सका। यह सुनकर पोते को एहसास हुआ कि यदि उसने जल्दबाज़ी में रिश्ता तोड़ लिया होता, तो वह एक सच्चा मित्र खो देता।

कुछ समय बाद एक और घटना हुई। सामने रहने वाले पड़ोसी ने रास्ते में उसे देखकर भी नमस्ते नहीं की। उसे बहुत बुरा लगा। लेकिन इस बार भी उसने कोई राय नहीं बनाई। अगले दिन पता चला कि पड़ोसी के पिता की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी और वे पूरी रात अस्पताल में रहे थे। उनकी चिंता में उन्हें आसपास की कोई बात याद ही नहीं रही।

अब दादाजी की सीख उसे समझ आने लगी थी।

साल बीतते गए। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह एक कंपनी में अधिकारी बन गया। एक दिन उसके अधीन काम करने वाले कर्मचारी से एक महत्वपूर्ण फाइल में बड़ी गलती हो गई। सभी लोग उसे तुरंत डाँटने और सज़ा देने की सलाह देने लगे। लेकिन उसने शांत स्वर में कहा, "आज इस विषय पर कोई निर्णय नहीं होगा। कल बात करेंगे।"

अगले दिन कर्मचारी स्वयं उसके पास आया। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि घर में अचानक आई परेशानी के कारण उसका ध्यान भटक गया था। उसने भरोसा दिलाया कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी।

उस दिन अधिकारी को अपने दादाजी की मुस्कान याद आ गई। उसे समझ में आ गया कि डर से नहीं, बल्कि समझ से इंसान बदलता है।

कई वर्षों बाद जब उसके अपने बेटे ने गुस्से में किसी मित्र के बारे में कठोर शब्द कहे, तो उसने भी वही सीख आगे बढ़ा दी।

वह मुस्कुराया और बोला—

"बेटा, किसी की गलती का फैसला उसी दिन मत करना। गुस्सा अक्सर सच को ढक देता है, लेकिन एक रात का धैर्य सच को सामने ले आता है।"

उस दिन बेटे को शायद यह बात पूरी तरह समझ नहीं आई, लेकिन पिता जानते थे कि जीवन एक दिन इसका अर्थ स्वयं समझा देगा।

याद रखिए, हर गलती के पीछे कोई न कोई कहानी होती है। इसलिए निर्णय लेने से पहले थोड़ा ठहरिए, सोचिए और समझिए। कई बार एक रात का धैर्य, पूरी ज़िंदगी के रिश्ते बचा लेता है।

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