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8/25/26

CH 06: पतंजलि योगसूत्र और क्रोध

 

पतंजलि योगसूत्र और क्रोध

क्रोध क्यों आता है और क्रोध के समय हमारा मन वास्तव में क्या कर रहा होता है?

क्रोध हमारे जीवन की सबसे सामान्य भावनाओं में से एक है।

किसी ने हमारी बात नहीं मानी—क्रोध आ गया।

किसी ने अपमान कर दिया—क्रोध आ गया।

हमारे काम में बाधा आई—क्रोध आ गया।

किसी ने हमारी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार नहीं किया—क्रोध आ गया।

कभी-कभी तो छोटी-सी बात पर भी इतना गुस्सा आता है कि बाद में स्वयं सोचते हैं—

“मैंने इतना गुस्सा क्यों किया?”

और कभी क्रोध शांत होने के बाद पछतावा भी होता है।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि क्रोध अच्छा है या बुरा।

असल प्रश्न है—

क्रोध हमारे भीतर पैदा कैसे होता है?

और उससे भी महत्वपूर्ण—

क्या हम क्रोध आने के बाद भी अपने व्यवहार को अपने नियंत्रण में रख सकते हैं?

पतंजलि योगसूत्र को इस दृष्टि से पढ़ें तो क्रोध को समझने के लिए हमें इच्छा, अप्रिय अनुभव, मानसिक प्रतिक्रिया और गलत विचारों के बीच संबंध को देखना पड़ता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.3, 2.7–2.8, 2.33–2.34)

क्रोध हमेशा अचानक पैदा नहीं होता

हमें लगता है कि किसी व्यक्ति ने कुछ गलत किया और उसी क्षण हमें गुस्सा आ गया।

लेकिन कई बार उसके पीछे मन की पहले से बनी हुई अपेक्षा होती है।

हम चाहते थे कि कोई व्यक्ति हमारी बात माने।

उसने नहीं मानी।

हम चाहते थे कि वह हमारी प्रशंसा करे।

उसने आलोचना कर दी।

हम चाहते थे कि कोई काम हमारी इच्छा के अनुसार हो।

वह वैसा नहीं हुआ।

इस तरह हमारे मन में पहले से बनी “यह ऐसा ही होना चाहिए” वाली धारणा टूटती है।

फिर उसके साथ विरोध पैदा होता है।

यहीं से क्रोध को समझने की एक दिशा मिलती है।


इच्छा और क्रोध का संबंध

मान लीजिए आपको किसी व्यक्ति से बहुत अपेक्षा है।

आप चाहते हैं कि वह हमेशा आपका सम्मान करे।

एक दिन वह आपके साथ ऐसा व्यवहार कर देता है जिसे आप अपमान समझते हैं।

अब केवल उसका व्यवहार ही समस्या नहीं रह जाता।

आपकी इच्छा थी—

“वह मेरे साथ इस तरह व्यवहार करे।”

वास्तविकता हुई—

“उसने मेरी इच्छा के अनुसार व्यवहार नहीं किया।”

फिर मन में विरोध पैदा हुआ।

यही विरोध आगे क्रोध का रूप ले सकता है।

पतंजलि योगसूत्र में सुखद अनुभव के पीछे पैदा होने वाली मजबूत चाह को राग और दुखद अनुभव के पीछे पैदा होने वाले विरोध को द्वेष कहा गया है।

सरल भाषा में समझें तो—

जिस चीज को हम बहुत चाहते हैं, उसके विपरीत होने पर हमें परेशानी हो सकती है।

और

जिस चीज को हम बिल्कुल नहीं चाहते, उसके सामने आने पर मन तीव्र विरोध कर सकता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.7–2.8)


जब “मेरी बात ही सही है” वाली भावना बढ़ जाती है

क्रोध में एक और चीज बहुत महत्वपूर्ण होती है—अपनी सोच को पूरी तरह सही मान लेना।

किसी विवाद में दोनों व्यक्ति सोच सकते हैं—

“गलती उसी की है।”

दोनों अपनी बात को सही मानते हैं।

दोनों दूसरे की बात सुनना बंद कर देते हैं।

फिर बातचीत समस्या का समाधान करने के बजाय एक-दूसरे को हराने का माध्यम बन जाती है।

यहाँ समस्या केवल घटना नहीं है।

समस्या यह भी है कि हमारा मन अपनी बनाई हुई समझ से चिपक गया है।

इसलिए क्रोध को समझने के लिए हमें यह पूछना उपयोगी हो सकता है—

क्या मैं वास्तविक घटना पर प्रतिक्रिया कर रहा हूँ या अपनी बनाई हुई व्याख्या पर?

यह प्रश्न कई बार क्रोध की जड़ तक पहुँचने में मदद कर सकता है।


क्रोध में हम अक्सर पूरी घटना नहीं देखते

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने आपको देखकर अभिवादन नहीं किया।

आपने सोचा—

“उसने जानबूझकर मुझे नजरअंदाज किया।”

अब आपको गुस्सा आने लगा।

लेकिन बाद में पता चला कि उसने आपको देखा ही नहीं था।

यहाँ वास्तविक घटना और मन की व्याख्या में अंतर था।

यही कारण है कि क्रोध के समय तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण रुकना उपयोगी हो सकता है।

अपने आप से पूछें—

“मुझे वास्तव में क्या पता है?”

“मैं क्या अनुमान लगा रहा हूँ?”

“क्या कोई दूसरी सम्भावना भी हो सकती है?”

इस तरह हम अपनी मानसिक प्रतिक्रिया को थोड़ा देखने लगते हैं।


क्रोध के समय मन क्या करता है?

क्रोध में हमारा मन अक्सर उसी घटना को बार-बार दोहराता है।

“उसने ऐसा क्यों कहा?”

“उसकी हिम्मत कैसे हुई?”

“मैं उसे ऐसा जवाब दूँगा।”

“उसने पहले भी ऐसा किया था।”

एक घटना कई बार मन में दोहराई जाती है।

हर बार भावनात्मक प्रतिक्रिया फिर से सक्रिय हो सकती है।

इस तरह घटना समाप्त हो जाने के बाद भी क्रोध हमारे भीतर चलता रहता है।

यहाँ पहले के विषयों में समझी गई स्मृति और मानसिक वृत्तियों की भूमिका भी दिखाई देती है।

हम केवल वर्तमान घटना पर प्रतिक्रिया नहीं करते; उससे जुड़ी पुरानी बातें भी मन में वापस आ सकती हैं।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.5–1.11)


क्या क्रोध को दबा देना समाधान है?

नहीं।

किसी व्यक्ति को बहुत गुस्सा आया और उसने कुछ नहीं कहा।

लेकिन भीतर लगातार उसी घटना को दोहराता रहा।

बाहर से वह शांत दिखाई दे रहा है, लेकिन भीतर क्रोध बना हुआ है।

इसलिए केवल क्रोध को बाहर न निकालना ही समाधान नहीं है।

हमें यह भी समझना होगा कि क्रोध पैदा करने वाली मानसिक प्रक्रिया क्या है।

किसी भावना को समझना और उसे तुरंत व्यवहार में बदल देना—दो अलग बातें हैं।

क्रोध आया है, यह एक अनुभव है।

क्रोध के कारण किसी को चोट पहुँचाना या गलत व्यवहार करना—यह एक अलग निर्णय है।

यही अंतर हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।


पतंजलि क्रोध और गलत विचारों के बारे में क्या दिशा देते हैं?

पतंजलि योगसूत्र के दूसरे पाद में एक महत्वपूर्ण बात आती है।

जब मन में अनुचित विचार या भावनाएँ परेशान करने लगें, तब उनके विपरीत दिशा पर विचार करने का अभ्यास बताया गया है।

इसे प्रतिपक्ष भावना कहा जाता है।

सरल भाषा में इसका अर्थ है—

जब मन किसी गलत या हानिकारक दिशा में जा रहा हो, तो उसके विपरीत और उचित विचार को जानबूझकर सामने लाना।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.33)


क्रोध के समय इसका क्या अर्थ हो सकता है?

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने आपके साथ गलत व्यवहार किया।

मन तुरंत कहता है—

“मैं भी उसे सबक सिखाऊँगा।”

यहीं रुककर हम विचार कर सकते हैं—

“अगर मैं इसी क्रोध में प्रतिक्रिया दूँगा तो क्या समस्या वास्तव में हल होगी?”

या—

“मैं अपनी बात दृढ़ता से कह सकता हूँ, लेकिन क्या अपमान करना जरूरी है?”

यह क्रोध को दबाना नहीं है।

यह क्रोध के प्रभाव में निर्णय लेने से पहले विवेक का उपयोग करना है।


क्रोध से पैदा होने वाले विचार भी नुकसान पहुँचा सकते हैं

पतंजलि के अनुसार अनुचित विचारों में हिंसा जैसी प्रवृत्तियाँ भी शामिल हैं और वे इच्छा, क्रोध या भ्रम से उत्पन्न हो सकती हैं। इन विचारों की तीव्रता कम या अधिक हो सकती है, लेकिन वे अंततः दुःख और परेशानी की दिशा में ले जाने वाले माने गए हैं।

इसलिए समस्या केवल तब नहीं शुरू होती जब हम किसी को नुकसान पहुँचा देते हैं।

नुकसान पहुँचाने की मानसिक प्रवृत्ति को भी पहचानना महत्वपूर्ण है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.34)


क्रोध के समय कुछ क्षण रुकना क्यों महत्वपूर्ण है?

क्रोध बहुत तेज भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।

उस समय हम ऐसी बातें कह सकते हैं जिन्हें बाद में वापस लेना मुश्किल होता है।

इसलिए एक छोटा-सा अंतर बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है—

क्रोध आया → तुरंत प्रतिक्रिया

और

क्रोध आया → उसे पहचाना → कुछ समय रुके → फिर निर्णय लिया।

दूसरी स्थिति में हमारे पास अपने व्यवहार को चुनने की संभावना अधिक होती है।

योग की दृष्टि से यही सजगता धीरे-धीरे महत्वपूर्ण बनती है।


क्या अहिंसा का अर्थ हमेशा चुप रहना है?

नहीं।

यदि कोई हमारे साथ गलत व्यवहार कर रहा है, तो उसका विरोध करना आवश्यक हो सकता है।

लेकिन विरोध और हिंसक क्रोध एक ही चीज नहीं हैं।

हम दृढ़ता से कह सकते हैं—

“यह व्यवहार स्वीकार नहीं है।”

लेकिन जरूरी नहीं कि इसके साथ अपमान, बदला या हिंसा भी हो।

पतंजलि योगसूत्र में अहिंसा को यमों में रखा गया है और उसके दृढ़ होने पर एक विशेष प्रभाव बताया गया है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.30 और 2.35)

इसका व्यावहारिक अर्थ यह हो सकता है कि दृढ़ता और क्रोध को एक ही चीज न समझें।


क्रोध के पीछे छिपी अपेक्षा को पहचानें

अगली बार जब बहुत क्रोध आए, तो केवल यह न पूछें—

“मुझे इतना गुस्सा क्यों आया?”

इसके साथ यह भी पूछें—

“मैं चाहता क्या था?”

कई बार उत्तर मिलेगा—

  • मैं चाहता था कि वह मेरी बात माने।
  • मैं चाहता था कि मुझे सम्मान मिले।
  • मैं चाहता था कि काम मेरी योजना के अनुसार हो।
  • मैं चाहता था कि मुझे कोई चुनौती न दे।
  • मैं चाहता था कि कोई मेरी आलोचना न करे।

तब हमें दिखाई दे सकता है कि क्रोध के पीछे कोई इच्छा, अपेक्षा या मानसिक पकड़ काम कर रही थी।

यहीं से क्रोध को समझना शुरू किया जा सकता है।


क्या हर क्रोध बुरा है?

क्रोध की भावना का अनुभव होना और क्रोध के आधार पर गलत काम करना एक बात नहीं है।

कभी किसी गलत कार्य को देखकर हमारे भीतर तीव्र प्रतिक्रिया होती है।

यह हमें कार्रवाई के लिए प्रेरित कर सकती है।

लेकिन यदि वही प्रतिक्रिया विवेक खो दे और हमें दूसरों को नुकसान पहुँचाने की ओर ले जाए, तो समस्या पैदा होती है।

इसलिए योगदृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न यह हो सकता है—

“क्रोध आया या नहीं?” से अधिक,

“क्रोध आने के बाद मैंने क्या किया?”


क्रोध को समझने की एक सरल प्रक्रिया

जब अगली बार क्रोध आए, तो इस क्रम को याद किया जा सकता है:

1. घटना को पहचानें

वास्तव में हुआ क्या?

2. अपनी व्याख्या पहचानें

मैंने उस घटना का अर्थ क्या निकाला?

3. अपनी अपेक्षा देखें

मैं चाहता क्या था?

4. विरोध को पहचानें

मुझे किस बात को स्वीकार करना कठिन लग रहा है?

5. प्रतिक्रिया रोकें

तुरंत निर्णय लेना आवश्यक है या कुछ समय रुक सकता हूँ?

6. उचित विकल्प देखें

क्या मैं अपनी बात बिना अनावश्यक चोट पहुँचाए रख सकता हूँ?

यह कोई अलग “पतंजलि तकनीक” के रूप में दावा नहीं है; बल्कि योगसूत्र में बताए गए विचारों को पहचानने, अनुचित विचारों के प्रति सजग होने और उनके विपरीत उचित दिशा पर विचार करने को जीवन में समझने का एक सरल तरीका है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.33–2.34)


क्रोध से मुक्ति का अर्थ क्या है?

क्रोध से मुक्त होने का अर्थ यह नहीं कि जीवन में कभी गुस्सा आए ही नहीं।

व्यावहारिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि—

क्रोध हमारा मालिक न बन जाए।

हम क्रोध को पहचान सकें।

उसके पीछे की इच्छा और अपेक्षा को देख सकें।

अपनी गलत समझ की संभावना को पहचान सकें।

और फिर अपने व्यवहार का निर्णय अधिक समझदारी से कर सकें।

यही मानसिक स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।


हमारे जीवन के लिए मुख्य बात

क्रोध कई बार बाहर की घटना से कम और उस घटना के प्रति हमारी इच्छा, अपेक्षा और मानसिक प्रतिक्रिया से अधिक जुड़ा होता है।

हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे अनुसार चले।

जब ऐसा नहीं होता, तो विरोध पैदा होता है।

विरोध बढ़ता है तो क्रोध आ सकता है।

और क्रोध के प्रभाव में हम ऐसे काम या शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं जिनका बाद में पछतावा होता है।

पतंजलि योगसूत्र हमें इस पूरी प्रक्रिया को समझने की दिशा देता है—चित्त की गतिविधियों को पहचानना, राग-द्वेष को समझना, अनुचित विचारों के प्रति सजग होना और उचित दिशा में मन को वापस लाना।

इसलिए अगली बार क्रोध आए तो केवल यह न सोचें—

“मुझे गुस्सा क्यों आया?”

एक कदम आगे बढ़कर पूछें—

“मेरी कौन-सी इच्छा, अपेक्षा या मानसिक धारणा इस क्रोध के पीछे काम कर रही है?”

यही प्रश्न क्रोध को दबाने के बजाय उसे समझने की शुरुआत हो सकता है।

योगसूत्र संदर्भ

मुख्य संदर्भ: सूत्र 1.5–1.11, 1.12–1.16, 1.33, 2.3, 2.7–2.8, 2.30, 2.33–2.35।

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