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8/25/26

CH 16: पतंजलि योगसूत्र और अभ्यास एवं वैराग्य

 

पतंजलि योगसूत्र और अभ्यास एवं वैराग्य

मन को बदलने की शुरुआत कहाँ से होती है?

हमने अब तक मन, विचार, चिंता, इच्छा, अहंकार, आसक्ति, भय, क्रोध, दुःख, कर्म, संस्कार और वासनाओं को समझा है।

अब एक स्वाभाविक प्रश्न सामने आता है—

यदि मन की पुरानी प्रवृत्तियाँ इतनी गहरी हैं, तो उन्हें बदला कैसे जाए?

क्या केवल यह जान लेना पर्याप्त है कि—

“मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए।”
“मुझे चिंता नहीं करनी चाहिए।”
“मुझे आसक्त नहीं होना चाहिए।”

नहीं।

जानकारी और वास्तविक परिवर्तन में अंतर है।

पतंजलि योगसूत्र इसी जगह अभ्यास और वैराग्य को सामने रखता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12)

अभ्यास और वैराग्य क्या हैं?

पतंजलि बहुत संक्षेप में कहते हैं—

अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्तवृत्तियों का निरोध किया जाता है।

सरल भाषा में—

मन को सही दिशा में बार-बार स्थिर करने का प्रयास अभ्यास है, और मन को हर आकर्षण तथा पकड़ के पीछे जाने से रोकने की क्षमता वैराग्य की दिशा है।

यहाँ दोनों को साथ समझना जरूरी है।

केवल अभ्यास हो और मन हर इच्छा के पीछे भागता रहे, तो स्थिरता कठिन होगी।

और केवल वैराग्य की बात हो लेकिन मन को सही दिशा में लगाने का अभ्यास न हो, तब भी परिवर्तन अधूरा रह सकता है।

इसलिए पतंजलि दोनों को साथ रखते हैं।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12)


अभ्यास का सरल अर्थ

अभ्यास का अर्थ केवल योगासन करना नहीं है।

पतंजलि के इस संदर्भ में अभ्यास का मुख्य विषय चित्त की स्थिरता है।

यदि मन बार-बार भटकता है और हम उसे बार-बार अपने चुने हुए विषय या दिशा में वापस लाते हैं, तो यह अभ्यास की प्रक्रिया हो सकती है।

उदाहरण के लिए—

आप ध्यान करने बैठे।

मन इधर चला गया।

आपको पता चला।

आप फिर ध्यान के विषय पर लौट आए।

कुछ देर बाद मन फिर भटक गया।

आप फिर लौट आए।

यही बार-बार लौटना अभ्यास का एक सरल उदाहरण है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.13)


अभ्यास का अर्थ एक दिन का प्रयास नहीं

पतंजलि अभ्यास को केवल कभी-कभार किए गए प्रयास के रूप में नहीं बताते।

सूत्र 1.14 में अभ्यास को लंबे समय तक, बिना रुकावट और उचित भावना के साथ किए जाने पर दृढ़ होने की बात कही गई है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.14)

इसका हमारे जीवन में सीधा अर्थ समझा जा सकता है।

यदि वर्षों से मन चिंता करने का आदी है, तो एक दिन ध्यान करने से चिंता हमेशा के लिए समाप्त हो जाए—ऐसी अपेक्षा उचित नहीं।

यदि वर्षों से हम क्रोध में तुरंत प्रतिक्रिया देते रहे हैं, तो एक बार शांत रहने से पुरानी प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।

नई दिशा को भी समय देना होगा।


अभ्यास का मतलब मन को जबरदस्ती दबाना नहीं

कई लोग सोचते हैं कि मन में कोई विचार नहीं आना चाहिए।

लेकिन पतंजलि की शिक्षा को इस तरह समझना उचित नहीं है कि—

“मन में कोई विचार आया तो मैं असफल हो गया।”

विचार आना एक बात है।

उस विचार में बह जाना दूसरी बात।

अभ्यास का अर्थ यह हो सकता है कि मन भटके तो हम उसे पहचानें और फिर अपनी चुनी हुई दिशा में वापस लाएँ।

इसलिए अभ्यास में जागरूकता और पुनः लौटना महत्वपूर्ण है।


वैराग्य क्या है?

वैराग्य शब्द सुनते ही कई लोगों के मन में संसार छोड़ने, परिवार छोड़ने या जंगल चले जाने की छवि आती है।

लेकिन पतंजलि के सूत्र 1.15 में वैराग्य को इस रूप में समझाया गया है कि देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा का अभाव हो।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.15)

सरल भाषा में—

वैराग्य का अर्थ वस्तुओं का अस्तित्व समाप्त करना नहीं, बल्कि उनके प्रति मन की अनियंत्रित पकड़ को कम करना है।

आपके पास वस्तु हो सकती है।

आप उसका उपयोग कर सकते हैं।

आप अपने परिवार से प्रेम कर सकते हैं।

आप अपना काम कर सकते हैं।

लेकिन आपका मन हर समय यह न कहे—

“इसके बिना मैं अधूरा हूँ।”

यही अंतर महत्वपूर्ण है।


आसक्ति और वैराग्य में अंतर

हम पहले आसक्ति पर चर्चा कर चुके हैं।

आसक्ति में वस्तु, व्यक्ति या परिणाम हमारे मन पर इतनी पकड़ बना सकता है कि उसके बिना हम अस्थिर हो जाएँ।

वैराग्य उसी पकड़ को ढीला करने की दिशा है।

उदाहरण के लिए—

आसक्ति:
“मुझे हर हाल में यही परिणाम चाहिए।”

वैराग्य:
“मैं पूरी मेहनत करूँगा, लेकिन परिणाम मेरी इच्छा के अनुसार न आए तो भी मैं पूरी तरह टूटूँगा नहीं।”

यहाँ वैराग्य का अर्थ काम छोड़ना नहीं है।

यह परिणाम के प्रति मानसिक पकड़ को कम करना है।


क्या वैराग्य का अर्थ इच्छाएँ खत्म करना है?

वैराग्य को इच्छा-विहीन जीवन के रूप में समझना बहुत सरल निष्कर्ष होगा।

व्यवहार में हमारे पास इच्छाएँ रहेंगी।

हमें भोजन चाहिए।

काम करना है।

परिवार की चिंता है।

भविष्य की योजनाएँ हैं।

उद्देश्य हैं।

समस्या इच्छा के होने में ही नहीं है।

समस्या तब हो सकती है जब इच्छा इतनी शक्तिशाली हो जाए कि—

मन उसकी आज्ञा के बिना रह ही न सके।

वैराग्य उस निर्भरता को कम करने की दिशा है।


अभ्यास और वैराग्य एक-दूसरे के पूरक क्यों हैं?

इसे एक बहुत सरल उदाहरण से समझें।

मान लीजिए आप अपना ध्यान एकाग्र करना चाहते हैं।

अभ्यास आपको बार-बार ध्यान वापस लाना सिखाएगा।

लेकिन उसी समय मोबाइल की notification आती है।

मन तुरंत मोबाइल की ओर भागता है।

यहाँ वैराग्य काम आता है—

“अभी इसे देखने की आवश्यकता नहीं है।”

अभ्यास आपको सही दिशा में रखता है।

वैराग्य आपको अनावश्यक आकर्षण से हटाता है।

इसलिए—

अभ्यास मन को एक दिशा देता है; वैराग्य मन को अनावश्यक दिशाओं में बहने से रोकता है।

यह एक सरल व्यावहारिक व्याख्या है; पतंजलि सूत्र स्वयं इसे इसी आधुनिक उदाहरण में नहीं कहते।


क्या अभ्यास बिना वैराग्य के सफल हो सकता है?

मान लीजिए कोई व्यक्ति ध्यान का अभ्यास करता है, लेकिन हर थोड़ी देर में किसी नई इच्छा के पीछे चला जाता है।

आज ध्यान।

कल कोई दूसरा तरीका।

फिर कोई नया लक्ष्य।

फिर कोई नया आकर्षण।

मन लगातार विषय बदलता रहता है।

ऐसी स्थिति में अभ्यास की स्थिरता कठिन हो सकती है।

इसलिए पतंजलि दोनों को साथ रखते हैं।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12)


क्या वैराग्य बिना अभ्यास के पर्याप्त है?

दूसरी स्थिति देखें।

कोई व्यक्ति कहता है—

“मुझे किसी चीज की इच्छा नहीं है।”

लेकिन उसका मन लगातार भटकता रहता है।

वह न किसी एक विषय पर टिकता है, न अपनी मानसिक गतिविधियों को देखता है।

सिर्फ “मुझे वैराग्य है” कह देने से चित्त स्थिर नहीं हो जाता।

इसलिए साधना में अभ्यास आवश्यक रहता है।


अभ्यास को मजबूत कैसे किया जाता है?

पतंजलि के अनुसार अभ्यास लंबे समय तक, निरंतर और उचित श्रद्धा के साथ किया जाए तो वह दृढ़ होता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.14)

हम इसे रोजमर्रा के जीवन में इस तरह समझ सकते हैं—

एक छोटा लेकिन नियमित प्रयास,

बड़े लेकिन कभी-कभार किए गए प्रयास से अधिक उपयोगी हो सकता है।

यदि आप रोज कुछ समय अपने मन को देखने का अभ्यास करते हैं, तो धीरे-धीरे आपको अपनी प्रतिक्रियाओं का पता पहले चलने लग सकता है।

पहले क्रोध के बाद पता चलता था।

फिर क्रोध के बीच में पता चलने लगा।

और धीरे-धीरे संभव है कि क्रोध आने से पहले ही उसके संकेत दिखाई देने लगें।

यहीं अभ्यास की उपयोगिता समझ में आती है।


अभ्यास केवल ध्यान के लिए नहीं

अभ्यास जीवन के अनेक क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।

क्रोध में

हर बार तुरंत जवाब देने के बजाय कुछ क्षण रुकना।

चिंता में

बार-बार भविष्य की कल्पना में जाने के बजाय वर्तमान कार्य पर लौटना।

इच्छा में

हर इच्छा को तुरंत पूरा न करना।

आसक्ति में

अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए परिणाम की पकड़ कम करना।

विचारों में

अनावश्यक विचारों को पहचानकर चुने हुए विषय पर लौटना।

इस प्रकार अभ्यास केवल ध्यान-कक्ष की चीज नहीं रहता।

वह जीवन जीने का तरीका बन सकता है।


वैराग्य का सबसे सरल परीक्षण

किसी चीज को छोड़ देना वैराग्य का पूरा प्रमाण नहीं है।

एक सरल प्रश्न पूछ सकते हैं—

“क्या मैं उस वस्तु के बिना भी मानसिक रूप से संतुलित रह सकता हूँ?”

यदि उत्तर पूरी तरह “नहीं” है, तो संभव है कि हमारे भीतर उसकी पकड़ अभी बहुत मजबूत हो।

वैराग्य धीरे-धीरे इस निर्भरता को कम करने की दिशा है।


वैराग्य का अर्थ उदासीनता नहीं

यह अंतर बहुत जरूरी है।

उदासीनता:
“मुझे किसी से कोई मतलब नहीं।”

वैराग्य:
“मुझे संबंधों और जिम्मेदारियों का महत्व समझ में आता है, लेकिन मैं अपनी मानसिक शांति को पूरी तरह उनके परिणाम पर निर्भर नहीं करता।”

एक व्यक्ति अपने परिवार से प्रेम करते हुए भी वैराग्य की दिशा में हो सकता है।

एक व्यक्ति अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हुए भी वैराग्य की दिशा में हो सकता है।

इसलिए वैराग्य को प्रेम-विहीनता या जिम्मेदारी से भागना समझना उचित नहीं।


वैराग्य का अगला स्तर

पतंजलि सूत्र 1.16 में वैराग्य के एक अधिक गहरे स्तर की चर्चा करते हैं, जिसे परवैराग्य कहा जाता है।

यह साधारण विषय-वैराग्य से आगे की अवस्था है।

यहाँ साधक की समझ और विवेक अधिक गहरा हो जाता है और प्रकृति के गुणों के प्रति भी वैराग्य की दिशा आती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.16)

यह विषय अभी हमारे लिए केवल इतना समझना पर्याप्त है कि—

वैराग्य की भी गहराई के स्तर हैं।

यह केवल किसी वस्तु को छोड़ देना नहीं है।


क्या अभ्यास और वैराग्य से जीवन की समस्याएँ तुरंत समाप्त हो जाएँगी?

नहीं।

योगसूत्र कोई त्वरित समाधान का दावा नहीं करता।

पुरानी मानसिक प्रवृत्तियाँ गहरी हो सकती हैं।

मन बार-बार भटक सकता है।

इच्छाएँ फिर उठ सकती हैं।

क्रोध फिर आ सकता है।

चिंता फिर लौट सकती है।

लेकिन साधना का उद्देश्य यह नहीं कि जीवन में कभी कोई विचार या भावना न आए।

उद्देश्य यह है कि हम उनके गुलाम न रहें।


जब अभ्यास टूट जाए तो क्या करें?

यह बहुत सामान्य स्थिति है।

कुछ दिन अभ्यास किया।

फिर छूट गया।

फिर मन में अपराधबोध आया—

“मैं तो कर ही नहीं सकता।”

यहाँ फिर से शुरुआत करना ही अभ्यास का हिस्सा है।

मन भटका तो वापस लाना।

अभ्यास छूटा तो फिर शुरू करना।

गलती हुई तो उससे सीखना।

इस प्रकार साधना में निरंतर लौटना महत्वपूर्ण है।


हमारे जीवन में अभ्यास और वैराग्य

हम इसे एक छोटे सूत्र की तरह याद रख सकते हैं—

जो सही है, उसे बार-बार करना — अभ्यास।

जो अनावश्यक रूप से मन को बाँधता है, उसकी पकड़ ढीली करना — वैराग्य।

दोनों मिलकर मन को अधिक स्वतंत्र बनाने की दिशा दे सकते हैं।

और यही कारण है कि पतंजलि ने चित्तवृत्ति-निरोध की चर्चा करते समय इन दोनों को साथ रखा।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12–1.16)


हमारे जीवन के लिए मुख्य बात

हम अपने मन को केवल समझकर नहीं बदल सकते।

हमें अभ्यास करना होगा।

लेकिन केवल प्रयास करते रहने से भी बात पूरी नहीं होगी, यदि मन हर इच्छा, आकर्षण और परिणाम के पीछे भागता रहे।

इसलिए वैराग्य भी आवश्यक है।

अभ्यास हमें बार-बार सही दिशा में लौटाता है।

वैराग्य हमें अनावश्यक पकड़ से मुक्त होने की दिशा देता है।

इसलिए जब अगली बार मन किसी पुरानी आदत या इच्छा की ओर जाए, तो केवल यह न कहें—

“मेरा मन ऐसा ही है।”

बल्कि दो प्रश्न पूछें—

“मुझे किस दिशा में लौटना है?”

और—

“मुझे किस पकड़ को ढीला करना है?”

यही दो प्रश्न अभ्यास और वैराग्य की व्यावहारिक दिशा को हमारे दैनिक जीवन से जोड़ सकते हैं।

योगसूत्र संदर्भ

मुख्य संदर्भ:
1.12 — अभ्यास और वैराग्य से चित्तवृत्ति-निरोध
1.13 — अभ्यास का स्वरूप
1.14 — दीर्घकालीन, निरंतर अभ्यास
1.15 — वैराग्य का स्वरूप
1.16 — परवैराग्य


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