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8/25/26

CH 07: पतंजलि योगसूत्र और हमारा भय

 

पतंजलि योगसूत्र और हमारा भय

हम डरते क्यों हैं और भय हमारे जीवन को कितना प्रभावित करता है?

भय हमारे जीवन का बहुत स्वाभाविक अनुभव है।

हमें बीमारी का डर हो सकता है।
आर्थिक नुकसान का डर हो सकता है।
नौकरी छूटने का डर हो सकता है।
किसी अपने को खोने का डर हो सकता है।
असफल होने का डर हो सकता है।
लोग क्या कहेंगे, इसका डर हो सकता है।

और एक ऐसा भय भी है जिसे हम शायद सबसे गहराई से अनुभव करते हैं—

मृत्यु का भय।

कभी-कभी कोई वास्तविक खतरा सामने नहीं होता, फिर भी मन आशंकित रहता है।

कभी हम जानते हैं कि कोई बात अभी हुई नहीं है, फिर भी उसका डर हमें परेशान करता रहता है।

इसलिए प्रश्न है—

भय हमारे भीतर पैदा कहाँ से होता है?

और क्या भय को पूरी तरह समाप्त करना ही योग का उद्देश्य है?

पतंजलि योगसूत्र को ध्यान से देखें तो भय को समझने के लिए हमें क्लेश, राग, द्वेष और विशेष रूप से अभिनिवेश को समझना पड़ता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.3, 2.7–2.9)

हर भय एक जैसा नहीं होता

यदि सामने कोई खतरनाक परिस्थिति है और हम उससे बचने का प्रयास करते हैं, तो यह सामान्य सावधानी हो सकती है।

उदाहरण के लिए सड़क पार करते समय तेज गति से आती गाड़ी देखकर पीछे हटना समझदारी है।

इसलिए योगसूत्र की चर्चा को यह समझना उचित नहीं होगा कि “डरना हमेशा गलत है।”

समस्या तब अलग रूप लेती है जब भय हमारे मन पर इतना प्रभाव डाल दे कि वास्तविक परिस्थिति से अधिक हमारी कल्पना हमें परेशान करने लगे।

उदाहरण के लिए—

अभी नौकरी सुरक्षित है, लेकिन मन लगातार सोचता है—

“कहीं नौकरी चली गई तो?”

अभी कोई बीमारी नहीं है, लेकिन मन लगातार संभावित बीमारी के बारे में सोचता रहता है।

अभी संबंध ठीक है, लेकिन मन बार-बार सोचता है—

“अगर यह व्यक्ति मुझे छोड़ दे तो?”

यहाँ वर्तमान से अधिक भविष्य की संभावना हमारे मन को प्रभावित कर रही है।


भय और हमारी इच्छाएँ

भय को समझने के लिए पिछले विषय की एक बात फिर याद करनी होगी।

हम जिन चीजों को बहुत चाहते हैं, उन्हें खोने का डर भी पैदा हो सकता है।

जिस व्यक्ति से बहुत लगाव है, उसे खोने का डर।

जिस पद को बहुत महत्व देते हैं, उसे खोने का डर।

जिस संपत्ति को अपनी सुरक्षा मानते हैं, उसके नष्ट होने का डर।

जिस प्रतिष्ठा को अपनी पहचान मानते हैं, उसके समाप्त होने का डर।

इसलिए कभी-कभी भय के पीछे केवल डर नहीं होता।

उसके पीछे यह भी छिपा होता है—

“मैं इसे किसी भी हालत में खोना नहीं चाहता।”

पतंजलि योगसूत्र में सुखद अनुभव से जुड़ी मानसिक पकड़ को राग और दुखद अनुभव से जुड़ी मानसिक विरोध की भावना को द्वेष कहा गया है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.7–2.8)


पतंजलि के अनुसार सबसे गहरा भय कौन-सा है?

पतंजलि पाँच प्रमुख क्लेशों की चर्चा करते हैं।

सरल भाषा में इन्हें मन को बाँधने वाली पाँच गहरी समस्याएँ कहा जा सकता है—

  • वास्तविकता को ठीक से न समझ पाना,
  • “मैं” को लेकर गलत पहचान,
  • सुखद चीजों से अत्यधिक लगाव,
  • दुखद चीजों से तीव्र विरोध,
  • और जीवन से चिपके रहने की गहरी प्रवृत्ति।

इनमें अंतिम को अभिनिवेश कहा गया है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.3)


अभिनिवेश क्या है?

“अभिनिवेश” शब्द सामान्य पाठक के लिए कठिन है।

सरल भाषा में इसे इस प्रकार समझ सकते हैं—

जीवन को किसी भी तरह बनाए रखने की बहुत गहरी प्रवृत्ति और मृत्यु से जुड़ा गहरा भय।

पतंजलि कहते हैं कि यह प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि ज्ञानी व्यक्ति में भी इसकी उपस्थिति देखी जा सकती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.9)

यानी मृत्यु का भय केवल उस व्यक्ति में नहीं होता जो जीवन को समझता नहीं है।

मनुष्य कितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले, शरीर और जीवन के समाप्त होने का प्रश्न उसके सामने अलग स्तर पर बना रह सकता है।


मृत्यु का भय इतना गहरा क्यों है?

हम अपने शरीर के साथ बहुत गहराई से जुड़े होते हैं।

हम कहते हैं—

“मेरा शरीर।”

लेकिन व्यवहार में हम शरीर को ही “मैं” मानने लगते हैं।

इसी तरह हम अपनी पहचान को—

  • परिवार,
  • नौकरी,
  • पद,
  • संपत्ति,
  • प्रतिष्ठा,
  • संबंध

से जोड़ लेते हैं।

फिर इनमें से किसी के खोने की संभावना भी हमें असुरक्षित कर सकती है।

और जब बात शरीर तथा जीवन के समाप्त होने तक पहुँचती है, तो भय और अधिक गहरा हो सकता है।

पतंजलि के दर्शन में “द्रष्टा”, चित्त और शरीर के संबंध को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है। यह प्रश्न धीरे-धीरे सामने आता है कि—

क्या जो कुछ मैं अनुभव करता हूँ, वही मेरा पूरा स्वरूप है?

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.3–1.4 तथा 2.20)


क्या मृत्यु का भय केवल मृत्यु के समय पैदा होता है?

नहीं।

मृत्यु का भय हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी कई रूपों में दिखाई दे सकता है।

बुढ़ापे का डर।

बीमारी का डर।

स्वास्थ्य को लेकर अत्यधिक चिंता।

अपने शरीर में होने वाले हर परिवर्तन से डर जाना।

किसी प्रिय व्यक्ति के बीमार होने पर अत्यधिक असुरक्षा।

कभी-कभी हम मृत्यु के बारे में सीधे नहीं सोचते, लेकिन उसके आसपास की संभावनाएँ हमारे मन में भय पैदा करती रहती हैं।

इसलिए मृत्यु का भय केवल अंतिम क्षण का विषय नहीं है।

यह जीवन के प्रति हमारी गहरी पकड़ से भी जुड़ा हुआ हो सकता है।


भय और कल्पना

हमने पिछले posts में देखा कि मन ऐसी घटनाओं की भी कल्पना कर सकता है जो अभी हुई नहीं हैं।

भय में यही क्षमता कभी-कभी बहुत शक्तिशाली हो जाती है।

मन एक संभावित घटना बनाता है।

फिर उस घटना का परिणाम सोचता है।

फिर उससे जुड़ी दूसरी समस्या सोचता है।

फिर तीसरी।

कुछ ही समय में मन ने एक ऐसी पूरी कहानी बना ली होती है जिसका वास्तविक जीवन में अभी कोई अस्तित्व नहीं है।

उदाहरण के लिए—

“अगर मुझे यह बीमारी हो गई तो?”

फिर—

“अगर बीमारी गंभीर हुई तो?”

फिर—

“अगर इलाज बहुत महँगा हुआ तो?”

फिर—

“अगर मैं काम नहीं कर पाया तो?”

घटना अभी हुई ही नहीं है।

लेकिन मन उससे जुड़ी पूरी श्रृंखला का अनुभव करने लगता है।

इसलिए भय को समझने के लिए कल्पना और वास्तविकता के बीच अंतर करना बहुत उपयोगी है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.5–1.9)


क्या हर भय से लड़ना चाहिए?

नहीं।

यदि कोई वास्तविक खतरा है तो उससे बचना चाहिए।

यदि स्वास्थ्य की समस्या है तो उचित चिकित्सा लेनी चाहिए।

यदि आर्थिक जोखिम है तो योजना बनानी चाहिए।

यदि किसी परिस्थिति में सावधानी आवश्यक है तो सावधानी रखनी चाहिए।

योग का अर्थ वास्तविक खतरे को नजरअंदाज करना नहीं है।

योग की दिशा यह समझने में सहायता कर सकती है कि—

कहाँ सावधानी आवश्यक है और कहाँ हमारा मन वास्तविकता से आगे जाकर भय की कहानी बना रहा है।

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।


भय में हमारा मन क्या करता है?

भय के समय मन अक्सर भविष्य की ओर भागता है।

वह पूछता है—

“अगर ऐसा हुआ तो?”

लेकिन समस्या यह है कि “अगर” की कोई सीमा नहीं होती।

एक संभावना दूसरी संभावना को जन्म देती रहती है।

यही कारण है कि भय में मन को वर्तमान में वापस लाना उपयोगी हो सकता है।

अपने आप से पूछें—

अभी वास्तव में क्या हो रहा है?

इस समय मेरे सामने वास्तविक समस्या क्या है?

मैं अभी क्या कर सकता हूँ?

और कौन-सी बातें केवल मेरी कल्पना हैं?

ये प्रश्न भय को तुरंत समाप्त करने का दावा नहीं करते, लेकिन वे हमें वास्तविकता और कल्पना के बीच अंतर करने में सहायता कर सकते हैं।


भय और वैराग्य

वैराग्य को हमने पिछले विषय में समझा था।

अब उसे भय से जोड़कर देखें।

जिस चीज के प्रति हमारी मानसिक पकड़ बहुत मजबूत है, उसके खोने का भय भी उतना ही बढ़ सकता है।

यदि हम किसी वस्तु को जीवन की पूरी सुरक्षा मान लें, तो उसके खोने की आशंका हमें बहुत परेशान कर सकती है।

यदि हम अपनी प्रतिष्ठा को अपनी पूरी पहचान मान लें, तो आलोचना का डर बढ़ सकता है।

यदि हम किसी संबंध को अपनी संपूर्ण सुरक्षा मान लें, तो उसके बदलने की संभावना भय पैदा कर सकती है।

वैराग्य की दिशा में हम धीरे-धीरे यह समझते हैं—

“मैं इन चीजों का महत्व समझ सकता हूँ, लेकिन मेरा पूरा अस्तित्व इन पर निर्भर नहीं है।”

यही मानसिक स्वतंत्रता भय को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.15–1.16)


भय और “मैं”

भय का एक गहरा संबंध हमारी पहचान से भी हो सकता है।

यदि मैं स्वयं को केवल शरीर मानता हूँ, तो शरीर में परिवर्तन और मृत्यु का भय बहुत गहरा हो सकता है।

यदि मैं स्वयं को केवल अपने पद से पहचानता हूँ, तो पद खोने का भय पैदा होगा।

यदि मैं स्वयं को केवल अपनी सफलता से पहचानता हूँ, तो असफलता डरावनी लगेगी।

यदि मैं स्वयं को केवल किसी संबंध से पहचानता हूँ, तो संबंध में परिवर्तन भय पैदा कर सकता है।

इसलिए पतंजलि की दृष्टि से “मैं कौन हूँ?” का प्रश्न केवल दार्शनिक प्रश्न नहीं है।

यह भय को समझने का भी प्रश्न है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.3–1.4, 2.6, 2.20)


क्या ज्ञान से भय समाप्त हो जाता है?

पतंजलि योगसूत्र हमें यह सरल दावा नहीं देता कि केवल कुछ बातें जान लेने से सभी भय समाप्त हो जाएँगे।

बल्कि योग का मार्ग अज्ञान से स्पष्ट समझ और विवेक की ओर जाने का मार्ग है।

जब हम वास्तविकता और अपनी मानसिक कल्पना में अंतर करना सीखते हैं, जब हम अपनी आसक्ति और विरोध को पहचानते हैं और जब हम अपने वास्तविक स्वरूप के बारे में अधिक गहराई से विचार करते हैं, तब भय के साथ हमारा संबंध बदल सकता है।

अर्थात् लक्ष्य केवल यह नहीं—

“मुझे डरना नहीं चाहिए।”

बल्कि—

“मुझे अपने डर को समझना चाहिए।”


भय के समय अभ्यास और एकाग्रता

पतंजलि चित्त को स्थिर करने के लिए अभ्यास की बात करते हैं।

भय के समय मन बार-बार उसी बात की ओर लौटता है।

ऐसे में मन को किसी उचित वर्तमान कार्य या ध्यान-विषय पर वापस लाने का अभ्यास उपयोगी हो सकता है।

यहाँ भी लक्ष्य मन को जबरदस्ती दबाना नहीं है।

मन भय की ओर गया—

उसे पहचानें।

फिर वर्तमान की ओर लौटाएँ।

फिर मन वापस गया—

फिर लौटाएँ।

यह लगातार लौटने की प्रक्रिया अभ्यास का एक व्यावहारिक रूप समझी जा सकती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12–1.14 तथा 1.32)


भय को समझने के लिए कुछ सरल प्रश्न

जब किसी बात का बहुत डर लगे, तो स्वयं से पूछ सकते हैं—

क्या अभी कोई वास्तविक खतरा सामने है?

या मैं भविष्य की कल्पना से डर रहा हूँ?

मैं वास्तव में किस चीज को खोने से डरता हूँ?

क्या मेरी किसी इच्छा या आसक्ति का इससे संबंध है?

क्या मैं अपनी पहचान को किसी व्यक्ति, वस्तु, पद या शरीर से बहुत अधिक जोड़ चुका हूँ?

इस समय मैं वास्तव में क्या कर सकता हूँ?

इन प्रश्नों का उद्देश्य भय को तुरंत मिटाना नहीं है।

इनका उद्देश्य भय को समझने की शुरुआत करना है।


मृत्यु के भय को कैसे समझें?

यह पतंजलि योगसूत्र का सबसे गहरा पक्ष है।

मृत्यु को केवल एक बाहरी घटना के रूप में देखने के बजाय योगदर्शन हमें यह भी पूछने के लिए प्रेरित करता है—

जिसे मैं “मैं” कहता हूँ, वह वास्तव में क्या है?

क्या मैं केवल शरीर हूँ?

क्या मैं केवल मन हूँ?

क्या मैं अपने विचार हूँ?

क्या मैं अपनी स्मृतियाँ हूँ?

या इन सबको देखने वाला कोई और स्तर भी है?

पतंजलि के यहाँ द्रष्टा/पुरुष की चर्चा इसी व्यापक दार्शनिक संदर्भ में आती है।

यहाँ से योग की यात्रा केवल भय कम करने की यात्रा नहीं रहती; वह अपने वास्तविक स्वरूप को समझने की यात्रा बन जाती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.3–1.4, 2.20 तथा आगे के संबंधित सूत्र)


हमारे जीवन के लिए मुख्य बात

भय को केवल दुश्मन मानकर उससे लड़ते रहना शायद पर्याप्त नहीं है।

कुछ भय हमें सावधान करते हैं।

कुछ भय हमें भविष्य की तैयारी करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

लेकिन कुछ भय हमारी कल्पना, आसक्ति और मानसिक पकड़ से इतने बढ़ जाते हैं कि वे वर्तमान जीवन को प्रभावित करने लगते हैं।

पतंजलि योगसूत्र विशेष रूप से अभिनिवेश के माध्यम से जीवन से चिपके रहने और मृत्यु के गहरे भय की ओर ध्यान दिलाता है।

इससे हमें एक महत्वपूर्ण दिशा मिलती है—

भय को केवल दबाना नहीं, उसे समझना आवश्यक है।

हम यह देख सकते हैं कि हमारा भय किससे जुड़ा है—

वास्तविक खतरे से?

भविष्य की कल्पना से?

किसी चीज को खोने की आसक्ति से?

या अपनी पहचान के बारे में किसी गहरी धारणा से?

यहीं से भय के साथ हमारे संबंध में परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है।

योगसूत्र संदर्भ

मुख्य संदर्भ: सूत्र 1.3–1.4, 1.5–1.16, 2.3, 2.7–2.9, 2.20 तथा संबंधित सूत्र। 

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