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8/25/26

CH 08: पतंजलि योगसूत्र और अहंकार

 

पतंजलि योगसूत्र और अहंकार

“मैं” की भावना क्या है और यह हमारे सुख-दुःख को कैसे प्रभावित करती है?

हम अपने जीवन में बहुत बार “मैं” शब्द का प्रयोग करते हैं।

मैंने यह किया।
मुझे यह पसंद है।
मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?
मेरा सम्मान होना चाहिए।
मेरी बात सही है।
मुझे कोई हरा नहीं सकता।

यह “मैं” हमारे सामान्य जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन कभी-कभी यही “मैं” इतना मजबूत हो जाता है कि हमारी खुशी, दुख, क्रोध, अपमान और भय सभी उससे जुड़ने लगते हैं।

किसी ने हमारी प्रशंसा की तो हमें बहुत अच्छा लगा।

किसी ने आलोचना की तो मन दुखी हो गया।

किसी ने हमारी बात नहीं मानी तो क्रोध आया।

किसी ने हमसे आगे निकलकर सफलता प्राप्त की तो भीतर असंतोष पैदा हुआ।

तब प्रश्न उठता है—

हमारे भीतर यह “मैं” कौन है, जिसके सम्मान, सफलता और असफलता से हमारा मन इतना प्रभावित होता है?

पतंजलि योगसूत्र इस प्रश्न को अस्मिता के माध्यम से समझाता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.3 और 2.6)


अहंकार और अस्मिता में क्या समझना चाहिए?

सामान्य बोलचाल में हम अहंकार शब्द का अर्थ घमंड या अपने आपको दूसरों से बड़ा समझना लेते हैं।

लेकिन पतंजलि योगसूत्र में संबंधित शब्द अस्मिता है।

सरल भाषा में इसे इस प्रकार समझ सकते हैं—

जब हमारी देखने-समझने की शक्ति और मन-बुद्धि की गतिविधियों के बीच ऐसा मेल बन जाता है कि हम मानसिक और व्यक्तिगत पहचान को ही अपना वास्तविक “मैं” मानने लगते हैं, तो इसे अस्मिता के रूप में समझाया जाता है।

यह केवल घमंड नहीं है।

इसलिए कोई व्यक्ति बाहर से बहुत विनम्र दिखाई दे, फिर भी उसके भीतर “मैं” की गहरी पहचान काम कर सकती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.6)


“मैं” की हमारी पहचान कैसे बनती है?

बचपन से ही हम अपने बारे में अनेक पहचान बना लेते हैं।

मैं लड़का हूँ या लड़की।

मैं इस परिवार का सदस्य हूँ।

मैं विद्यार्थी हूँ।

मैं शिक्षक हूँ।

मैं अधिकारी हूँ।

मैं सफल व्यक्ति हूँ।

मैं गरीब हूँ।

मैं अमीर हूँ।

मैं बुद्धिमान हूँ।

मैं कमजोर हूँ।

इनमें से कई पहचान सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब हम इन पहचानों को ही अपना पूरा अस्तित्व मान लेते हैं।

उदाहरण के लिए—

किसी व्यक्ति की नौकरी चली गई।

यदि वह केवल यह समझता है कि “मेरी नौकरी चली गई”, तो वह परिस्थिति का सामना कर सकता है।

लेकिन यदि उसके मन में यह बन जाए—

“मेरी नौकरी चली गई, इसलिए मैं कुछ नहीं हूँ।”

तो नौकरी का नुकसान उसकी पूरी आत्म-पहचान पर चोट बन जाता है।

यहीं “घटना” और “मैं” के बीच संबंध को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।


जब कोई हमारी आलोचना करता है तो हमें इतना बुरा क्यों लगता है?

किसी व्यक्ति ने हमारे काम की आलोचना की।

यदि हम काम को अपने “मैं” से अलग देख सकें, तो हम सोच सकते हैं—

“क्या इसमें कोई गलती है? अगर है तो मैं सुधार सकता हूँ।”

लेकिन यदि हमारी पहचान इस बात से जुड़ी है कि—

“मैं हमेशा सही हूँ।”

तो आलोचना केवल काम की आलोचना नहीं रह जाती।

हमें लगता है—

“उसने मेरा अपमान किया।”

फिर मन बचाव करने लगता है।

क्रोध आ सकता है।

बहस शुरू हो सकती है।

संबंध खराब हो सकता है।

इसलिए कई बार हमारी परेशानी केवल दूसरे व्यक्ति के शब्दों से नहीं होती।

हमारी अपनी “मैं” से जुड़ी पहचान भी उस प्रतिक्रिया को बढ़ा सकती है।


सफलता भी अहंकार को मजबूत कर सकती है

अहंकार केवल असफलता में ही दिखाई नहीं देता।

सफलता भी “मैं” की भावना को बहुत मजबूत कर सकती है।

किसी व्यक्ति को सफलता मिली।

लोगों ने उसकी प्रशंसा की।

अब उसके मन में धीरे-धीरे यह भावना बन सकती है—

“मैं दूसरों से बेहतर हूँ।”

फिर जब कोई दूसरा व्यक्ति उससे आगे निकलता है, तो उसे यह स्वीकार करना कठिन लग सकता है।

इससे तुलना, ईर्ष्या और असंतोष पैदा हो सकते हैं।

इसलिए योगदर्शन की दृष्टि से केवल असफलता से दुखी होना ही समस्या नहीं है।

सफलता के साथ बनने वाली अत्यधिक “मैं” की पहचान भी मन को बाँध सकती है।


अहंकार और राग-द्वेष का संबंध

हमने पिछले posts में राग और द्वेष को समझा है।

अब इन्हें “मैं” से जोड़कर देखें।

यदि मैं किसी वस्तु को अपनी प्रतिष्ठा का हिस्सा मानता हूँ, तो उसे पाने की इच्छा बढ़ सकती है।

यदि कोई व्यक्ति मेरी प्रतिष्ठा को चुनौती देता है, तो उसके प्रति विरोध पैदा हो सकता है।

यदि कोई मेरी प्रशंसा करता है, तो मैं उसके प्रति आकर्षित हो सकता हूँ।

यदि कोई मेरी आलोचना करता है, तो मैं उससे द्वेष करने लग सकता हूँ।

इस प्रकार—

“मैं” → मेरी पहचान → मेरी पसंद/नापसंद → राग-द्वेष → सुख-दुःख

का एक चक्र बन सकता है।

पतंजलि योगसूत्र में अस्मिता, राग और द्वेष को एक ही व्यापक समूह—क्लेशों—में रखा गया है।

सरल भाषा में इन्हें मन को बाँधने वाली गहरी समस्याएँ समझ सकते हैं।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.3, 2.6–2.8)


क्या हर “मैं” गलत है?

नहीं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

व्यवहार में हमें अपनी पहचान की आवश्यकता होती है।

हमें अपना नाम पता होना चाहिए।

अपना काम पता होना चाहिए।

अपनी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए।

अपने परिवार और समाज में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

इसलिए योग का उद्देश्य यह नहीं कि हम रोजमर्रा के जीवन में “मैं” शब्द बोलना बंद कर दें।

समस्या व्यावहारिक पहचान में नहीं, बल्कि उस पहचान को अपना पूर्ण और अंतिम स्वरूप मान लेने में है।


“मैं” और द्रष्टा

यहीं पतंजलि योगसूत्र का विचार और गहरा हो जाता है।

योगसूत्र के प्रारंभिक भाग में द्रष्टा और चित्त की वृत्तियों के बीच अंतर की दिशा दिखाई जाती है।

सरल भाषा में समझें—

हमारे भीतर विचार आते हैं।

भावनाएँ आती हैं।

स्मृतियाँ आती हैं।

हम अपने बारे में धारणाएँ बनाते हैं।

लेकिन जो इन अनुभवों को जानता या देखता है, उसके बारे में भी प्रश्न उठता है—

क्या मैं केवल अपने मन की गतिविधियाँ हूँ, या मेरे अस्तित्व का कोई ऐसा स्तर भी है जो इन गतिविधियों को देख सकता है?

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.3–1.4)

यहीं से “मैं कौन हूँ?” का प्रश्न केवल सामान्य आत्म-चिंतन नहीं रह जाता, बल्कि योगदर्शन का गहरा प्रश्न बन जाता है।


अस्मिता को समझना क्यों जरूरी है?

यदि हम अपनी हर मानसिक स्थिति को “मैं” मान लेते हैं, तो मन लगातार बदलता रहेगा और उसके साथ हमारी पहचान भी बदलती रहेगी।

आज मैं सफल हूँ—

“मैं सफल हूँ।”

कल असफलता मिली—

“मैं असफल हूँ।”

आज किसी ने प्रशंसा की—

“मैं बहुत अच्छा हूँ।”

कल किसी ने आलोचना की—

“मैं बेकार हूँ।”

इस तरह हमारा “मैं” दूसरों के व्यवहार और परिस्थितियों पर निर्भर हो जाता है।

पतंजलि का दर्शन हमें इससे आगे जाकर यह देखने की दिशा देता है कि द्रष्टा और चित्त की बदलती अवस्थाओं में अंतर है।


अहंकार के कारण संबंधों में क्या होता है?

अहंकार का प्रभाव केवल आध्यात्मिक जीवन पर नहीं पड़ता।

परिवार में—

“मेरी बात ही सही है।”

पति-पत्नी के संबंध में—

“पहले वही माफी माँगे।”

काम की जगह पर—

“मेरे सुझाव को कैसे अस्वीकार किया जा सकता है?”

मित्रता में—

“उसने मुझे फोन क्यों नहीं किया?”

इनमें कई बार वास्तविक समस्या छोटी होती है, लेकिन “मैं” उससे बड़ा मुद्दा बना देता है।

यदि हमारा मन लगातार यह देखता रहे कि—

“मेरे साथ क्या हुआ?”

“मुझे कितना सम्मान मिला?”

“मेरी बात मानी गई या नहीं?”

तो संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।


क्या विनम्र होना ही अहंकार से मुक्ति है?

जरूरी नहीं।

कोई व्यक्ति बाहर से बहुत विनम्र हो सकता है, लेकिन भीतर लगातार यह सोच सकता है—

“देखो, मैं कितना विनम्र हूँ।”

इसलिए अहंकार केवल ऊँची आवाज में बोलने या दूसरों को नीचा दिखाने का नाम नहीं है।

कभी-कभी अपनी आध्यात्मिक प्रगति पर गर्व भी “मैं” की एक नई पहचान बन सकता है।

उदाहरण के लिए—

“मैं दूसरों से अधिक ध्यान करता हूँ।”

“मैं उनसे अधिक आध्यात्मिक हूँ।”

यह भी एक नई तरह की पहचान बन सकती है।

इसलिए योगदर्शन में समस्या केवल बाहरी व्यवहार की नहीं, बल्कि भीतर की पहचान और उससे जुड़ी मानसिक पकड़ की है।


अहंकार और दुख का संबंध

यदि मेरी खुशी इस बात पर निर्भर है कि लोग मुझे सम्मान दें, तो हर आलोचना दुख देगी।

यदि मेरी खुशी इस बात पर निर्भर है कि मैं हमेशा सफल रहूँ, तो हर असफलता मुझे भीतर से तोड़ सकती है।

यदि मेरी पहचान किसी विशेष वस्तु से जुड़ी है, तो उसे खोने का भय पैदा होगा।

यदि मेरी पहचान किसी संबंध से जुड़ी है, तो उस संबंध में बदलाव मुझे असुरक्षित कर सकता है।

इस तरह “मैं” की मजबूत पकड़ कई दूसरे मानसिक अनुभवों को जन्म दे सकती है—

राग, द्वेष, भय, चिंता, क्रोध और दुख।

यही कारण है कि पतंजलि ने अस्मिता को केवल एक सामाजिक व्यवहार की समस्या के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे क्लेश के रूप में रखा।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.3, 2.6–2.9)


अपने अहंकार को पहचानने की शुरुआत कैसे करें?

हमें तुरंत यह घोषणा करने की आवश्यकता नहीं कि—

“मुझमें अहंकार है।”

इसके बजाय अपने व्यवहार को देखना अधिक उपयोगी हो सकता है।

जब कोई मेरी आलोचना करे, तो मैं क्या करता हूँ?

जब कोई मेरी बात न माने, तो मेरी प्रतिक्रिया क्या होती है?

जब कोई मुझसे आगे निकल जाए, तो मुझे कैसा लगता है?

जब मेरी प्रशंसा न हो, तो क्या मेरा मन बेचैन हो जाता है?

जब कोई मेरी गलती बताए, तो क्या मैं उसे स्वीकार कर सकता हूँ?

इन सवालों के जवाब हमारे भीतर काम कर रही “मैं” की भावना को पहचानने में मदद कर सकते हैं।


क्या अपनी गलती स्वीकार करना अहंकार को कम कर सकता है?

व्यावहारिक जीवन में यह एक महत्वपूर्ण अभ्यास हो सकता है।

यदि हमसे गलती हुई है और हम कह सकें—

“हाँ, यहाँ मुझसे गलती हुई है।”

तो इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा पूरा व्यक्तित्व खराब है।

हम केवल एक गलती को स्वीकार कर रहे हैं।

इससे “मैं हमेशा सही हूँ” वाली मानसिक पकड़ कमजोर हो सकती है।

इसी तरह कोई दूसरा व्यक्ति हमसे बेहतर कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम बेकार हैं।

दूसरे की सफलता और हमारी असफलता एक-दूसरे के विरोधी प्रमाण नहीं हैं।

यह समझ “मैं” को अधिक संतुलित बना सकती है।


योग की दिशा में “मैं” को समझना

पतंजलि योगसूत्र में योग की अंतिम दिशा केवल एक बेहतर सामाजिक व्यक्तित्व बनना नहीं है।

योगदर्शन आगे जाकर पुरुष और प्रकृति, द्रष्टा और चित्त तथा विवेक की बात करता है।

इसलिए “अहंकार कम करना” इस यात्रा का केवल व्यावहारिक हिस्सा है।

गहरी दिशा यह प्रश्न है—

जो कुछ बदल रहा है, क्या वही मेरा वास्तविक स्वरूप है?

हमारा शरीर बदलता है।

विचार बदलते हैं।

भावनाएँ बदलती हैं।

स्मृतियाँ बदलती हैं।

भूमिकाएँ बदलती हैं।

लेकिन योगदर्शन उस द्रष्टा की ओर ध्यान ले जाता है जो इन परिवर्तनों को जानता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.3–1.4, 2.6, 2.20–2.21)


हमारे जीवन के लिए मुख्य बात

अहंकार को केवल घमंड समझना पतंजलि के विचार को बहुत छोटा कर देगा।

यहाँ असली प्रश्न हमारी “मैं” की पहचान का है।

जब हम अपने शरीर, पद, सफलता, विचार, संबंध या सामाजिक पहचान को ही अपना पूरा स्वरूप मान लेते हैं, तो इन चीजों में होने वाला हर परिवर्तन हमारे सुख-दुःख को प्रभावित करने लगता है।

पतंजलि योगसूत्र हमें इस पहचान को देखने और समझने की दिशा देता है।

व्यावहारिक जीवन में इसका अर्थ यह हो सकता है—

अपनी जिम्मेदारी निभाएँ, लेकिन हर भूमिका को अपना पूरा अस्तित्व न मानें।

अपनी सफलता का आनंद लें, लेकिन उसे अपनी अंतिम पहचान न बनाएँ।

अपनी गलती स्वीकार करें, लेकिन स्वयं को ही असफल व्यक्ति न मान लें।

दूसरों की आलोचना सुनें, लेकिन उसे अपने पूरे अस्तित्व पर हमला न समझें।

और सबसे महत्वपूर्ण—

“मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न को केवल नाम, पद, शरीर और उपलब्धियों तक सीमित न रखें।

यहीं से पतंजलि योगसूत्र का “द्रष्टा” और “स्वरूप” संबंधी विचार हमारे जीवन में एक गहरा अर्थ प्राप्त करता है।

योगसूत्र संदर्भ

मुख्य संदर्भ: सूत्र 1.3–1.4, 2.3, 2.6–2.9, 2.20–2.21 तथा विषय से संबंधित अन्य सूत्र।

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