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8/25/26

CH 05: पतंजलि योगसूत्र और हमारी इच्छाएँ

 

पतंजलि योगसूत्र और हमारी इच्छाएँ

हम जो चाहते हैं, वही हमें सुखी क्यों नहीं कर पाता?

मनुष्य के जीवन में इच्छाएँ होना स्वाभाविक है। हम कुछ पाना चाहते हैं, कुछ बचाकर रखना चाहते हैं और कुछ ऐसी चीजों से दूर रहना चाहते हैं जो हमें अच्छी नहीं लगतीं।

कभी इच्छा पूरी होती है तो हमें खुशी मिलती है। लेकिन कई बार इच्छा पूरी होने के बाद भी कुछ समय में मन फिर किसी नई चीज की तलाश करने लगता है।

कभी हम सोचते हैं—

“बस यह एक काम हो जाए, फिर मैं खुश रहूँगा।”

काम पूरा हो जाता है, लेकिन थोड़े समय बाद मन कहता है—

“अब यह मिल जाए तो अच्छा होगा।”

यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—

क्या हमारी इच्छाएँ ही हमारे सुख का आधार बन गई हैं?

पतंजलि योगसूत्र में मनुष्य की इच्छाओं और मानसिक बंधन को समझने के लिए राग, द्वेष और वैराग्य जैसे विचार बहुत महत्वपूर्ण हैं।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.15–1.16 तथा 2.3, 2.7–2.8)

इच्छा और आवश्यकता में अंतर

हमारे जीवन में हर इच्छा गलत नहीं होती।

भोजन की आवश्यकता है।
घर की आवश्यकता हो सकती है।
शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है।

समस्या तब पैदा होती है जब कोई वस्तु या परिणाम हमारे लिए केवल उपयोगी चीज न रहकर मानसिक सुख की अनिवार्य शर्त बन जाता है।

उदाहरण के लिए—

“अगर मुझे यह पद नहीं मिला तो मैं खुश नहीं रह सकता।”

या—

“अगर यह व्यक्ति हमेशा मेरे साथ नहीं रहा तो मेरा जीवन अधूरा है।”

यहाँ इच्छा धीरे-धीरे मानसिक निर्भरता में बदल सकती है।

पतंजलि की दृष्टि से इसी तरह की मानसिक पकड़ को समझना महत्वपूर्ण है।


सुखद अनुभव की चाह कैसे बढ़ती है?

जब हमें किसी वस्तु, व्यक्ति या अनुभव से सुख मिलता है, तो मन उसे दोबारा पाने की इच्छा कर सकता है।

एक बार अच्छा भोजन मिला—फिर वही स्वाद चाहिए।

किसी काम में प्रशंसा मिली—फिर प्रशंसा की अपेक्षा होने लगी।

किसी पद से सम्मान मिला—फिर उस सम्मान को खोने का डर पैदा हो सकता है।

इस प्रकार एक सुखद अनुभव आगे चलकर उसे दोबारा पाने की चाह पैदा कर सकता है।

पतंजलि योगसूत्र में सुख के अनुभव के पीछे उत्पन्न होने वाली ऐसी मानसिक पकड़ को राग से जोड़ा गया है।

सरल भाषा में कहें तो—

जिस चीज से हमें सुख मिला, उसके प्रति मन की मजबूत चाह राग की दिशा में ले जा सकती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.7)


केवल पाने की इच्छा ही समस्या नहीं है

हम अक्सर सोचते हैं कि मन की परेशानी केवल किसी चीज को पाने की इच्छा से होती है।

लेकिन इसके दूसरी तरफ भी एक मजबूत मानसिक प्रतिक्रिया होती है—

“यह मेरे साथ नहीं होना चाहिए।”

किसी व्यक्ति से हमें बुरा अनुभव हुआ।

अब हम उसे देखते ही परेशान हो जाते हैं।

किसी काम में असफलता मिली।

अब वैसी परिस्थिति का नाम सुनते ही डर या विरोध पैदा हो सकता है।

किसी घटना से दुख हुआ।

अब मन उसी तरह की किसी भी स्थिति से बचना चाहता है।

पतंजलि इसे द्वेष के रूप में समझाते हैं।

सरल भाषा में—

किसी अप्रिय अनुभव से पैदा हुई ऐसी मानसिक दूरी या विरोध, जो हमें लगातार उसी से बचने के लिए खींचता रहे, द्वेष की दिशा में जा सकता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.8)


राग और द्वेष हमारे जीवन को कैसे चलाते हैं?

यदि हम अपने दिन को ध्यान से देखें तो बहुत-से निर्णय दो बातों से प्रभावित होते दिखाई दे सकते हैं—

“मुझे यह चाहिए।”

या

“मुझे यह नहीं चाहिए।”

हमें कोई काम पसंद है—हम उसकी ओर जाते हैं।

कोई काम पसंद नहीं है—हम उससे बचते हैं।

कोई व्यक्ति हमें अच्छा लगता है—हम उसके करीब जाना चाहते हैं।

कोई व्यक्ति हमें बुरा लगता है—हम उससे दूर रहना चाहते हैं।

यह सामान्य जीवन का हिस्सा है।

लेकिन जब यही आकर्षण और विरोध हमारी मानसिक स्वतंत्रता को कम करने लगें, तब समस्या शुरू होती है।

हम वस्तु या व्यक्ति को केवल उसके वास्तविक रूप में नहीं देख पाते; हमारा मन पहले से बनी पसंद या नापसंद के चश्मे से उसे देखने लगता है।

यही कारण है कि पतंजलि के यहाँ राग और द्वेष केवल भावनाएँ नहीं, बल्कि मन को बाँधने वाली प्रवृत्तियाँ बन जाते हैं।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.3, 2.7–2.8)


इच्छा पूरी होने के बाद भी मन शांत क्यों नहीं रहता?

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने बहुत मेहनत करके अपनी पसंद की कार खरीद ली।

कुछ दिनों तक उसे बहुत खुशी हुई।

फिर वह दूसरी महँगी कार देखकर सोचने लगा—

“काश मेरे पास यह होती।”

यहाँ पहली इच्छा पूरी हो चुकी है।

फिर भी मन पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ।

ऐसा इसलिए हो सकता है कि सुख का अनुभव स्थायी नहीं था और मन ने फिर किसी नए अनुभव की ओर देखना शुरू कर दिया।

इसी तरह नौकरी में पदोन्नति मिली तो खुशी हुई।

लेकिन कुछ समय बाद अगली पदोन्नति की चिंता शुरू हो गई।

एक लक्ष्य पूरा हुआ, फिर दूसरा लक्ष्य सामने आ गया।

इसलिए केवल इच्छाएँ पूरी करते जाना मन को स्थायी संतोष देने की गारंटी नहीं है।


क्या इच्छा छोड़ देना ही वैराग्य है?

यहाँ पतंजलि की शिक्षा को गलत समझने से बचना जरूरी है।

वैराग्य का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य जीवन की सभी इच्छाएँ समाप्त कर दे या संसार से भाग जाए।

पतंजलि योगसूत्र के अनुसार वैराग्य का संबंध देखे और सुने गए विषयों के प्रति तृष्णा के कम होने से है।

सरल भाषा में—

वस्तु का होना समस्या नहीं है; उस वस्तु के बिना मैं ठीक नहीं रह सकता—यह मानसिक निर्भरता समस्या बन सकती है।

आप अच्छी वस्तु रखें, अच्छा भोजन करें, सफलता प्राप्त करें, परिवार से प्रेम करें—लेकिन अपनी पूरी मानसिक शांति को इन चीजों के नियंत्रण में न सौंपें।

यही वैराग्य को समझने की एक व्यावहारिक दिशा हो सकती है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.15)


क्या वैराग्य का अर्थ उदासीन हो जाना है?

नहीं।

वैराग्य और उदासीनता एक बात नहीं हैं।

उदासीन व्यक्ति कह सकता है—

“मुझे किसी चीज से कोई मतलब नहीं।”

लेकिन वैराग्य की दिशा यह हो सकती है—

“मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभाऊँगा, लेकिन परिणाम के प्रति ऐसी मानसिक पकड़ नहीं बनाऊँगा कि वही मेरी शांति तय करे।”

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

एक माता-पिता अपने बच्चे की सफलता चाहते हैं।

यह स्वाभाविक है।

लेकिन यदि बच्चे के परिणाम को ही अपनी पूरी खुशी और अपनी प्रतिष्ठा का आधार बना लिया जाए, तो मानसिक दबाव बढ़ सकता है।

प्रेम बना रह सकता है, जिम्मेदारी बनी रह सकती है और प्रयास भी जारी रह सकता है—लेकिन मानसिक पकड़ कम हो सकती है।


इच्छा, भय और चिंता का संबंध

हमने पिछले posts में चिंता के बारे में देखा।

अब राग और द्वेष को उससे जोड़कर देखें।

जिस चीज को हम बहुत अधिक चाहते हैं, उसके खोने का डर पैदा हो सकता है।

और

जिस चीज से हम बहुत अधिक बचना चाहते हैं, उसके सामने आने की आशंका चिंता पैदा कर सकती है।

इस तरह—

राग → पाने की तीव्र चाह

द्वेष → अप्रिय चीज से बचने की तीव्र चाह

और दोनों के बीच मन लगातार खिंचता रह सकता है।

इसीलिए इच्छा को समझना केवल आध्यात्मिक विषय नहीं है। यह हमारे रोजमर्रा के सुख-दुःख और मानसिक शांति से भी जुड़ा हुआ है।


इच्छा को दबाना समाधान नहीं है

यदि मन में कोई इच्छा उठी तो उसे जबरदस्ती दबा देना ही वैराग्य नहीं है।

दमन और वैराग्य में अंतर है।

दमन में इच्छा भीतर बनी रह सकती है, लेकिन हम उसे स्वीकार नहीं करते।

वैराग्य की दिशा में हम इच्छा को देखते और समझते हैं, लेकिन उसके पीछे अनिवार्य रूप से चलना आवश्यक नहीं समझते।

उदाहरण के लिए—

मन में आया कि अभी मोबाइल देखना चाहिए।

हम तुरंत मोबाइल उठा सकते हैं।

लेकिन यदि हम एक क्षण रुककर देखें—

“क्या वास्तव में अभी इसकी आवश्यकता है?”

और आवश्यकता न होने पर भी मोबाइल न देखने का निर्णय ले सकें, तो यह मानसिक स्वतंत्रता की छोटी-सी शुरुआत हो सकती है।


अभ्यास और वैराग्य साथ क्यों चलते हैं?

पतंजलि योगसूत्र में चित्त की वृत्तियों को स्थिर करने के लिए अभ्यास और वैराग्य दोनों को साथ रखा गया है।

केवल अभ्यास हो लेकिन मन हर आकर्षण के पीछे चला जाए, तो स्थिरता कठिन हो सकती है।

और केवल वैराग्य की बात हो लेकिन मन को स्थिर रखने का अभ्यास न हो, तब भी कठिनाई रह सकती है।

इसलिए—

अभ्यास मन को सही दिशा में बार-बार लाता है।

वैराग्य मन को हर आकर्षण के पीछे भागने से धीरे-धीरे मुक्त करता है।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12–1.16)


हमारे जीवन में इसका प्रयोग कैसे करें?

जब भी कोई इच्छा बहुत मजबूत हो, तुरंत उसे गलत मानने के बजाय कुछ प्रश्न पूछ सकते हैं—

मुझे वास्तव में इसकी आवश्यकता है या केवल इच्छा है?

अगर यह नहीं मिला तो क्या मैं बिल्कुल असहाय हो जाऊँगा?

क्या मेरी खुशी पूरी तरह इस वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर हो गई है?

क्या मैं अपनी पूरी कोशिश कर सकता हूँ और फिर भी परिणाम को स्वीकार कर सकता हूँ?

क्या यह इच्छा मुझे आगे बढ़ा रही है या मुझे अपने नियंत्रण में ले रही है?

इन प्रश्नों का उद्देश्य इच्छाओं को समाप्त करना नहीं है।

उद्देश्य है—

इच्छा हमारे जीवन को चलाए या हम अपनी समझ से इच्छा को दिशा दें।


संतोष कहाँ आता है?

पतंजलि योगसूत्र में संतोष को नियमों में रखा गया है।

संतोष का सरल अर्थ यह नहीं कि मनुष्य प्रगति करना बंद कर दे।

इसका अर्थ यह समझना अधिक उपयोगी है कि वर्तमान में जो उपलब्ध है, उसके प्रति लगातार असंतोष में जलते रहना आवश्यक नहीं है।

हम बेहतर जीवन के लिए प्रयास कर सकते हैं और साथ ही वर्तमान को पूरी तरह अस्वीकार किए बिना जी सकते हैं।

(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.32 और 2.42)

इससे एक सुंदर संतुलन बनता है—

प्रयास भी रहे और अनावश्यक मानसिक बेचैनी भी कम हो।


हमारे जीवन के लिए मुख्य बात

इच्छाएँ हमारे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं।

समस्या इच्छा होने में नहीं, बल्कि इच्छा के साथ हमारे संबंध में हो सकती है।

जब सुख पाने की चाह इतनी मजबूत हो जाए कि उसके बिना हम शांत न रह सकें, तब राग हमें बाँध सकता है।

जब किसी अप्रिय चीज से बचने की चाह इतनी मजबूत हो जाए कि उसका विचार ही हमें परेशान करने लगे, तब द्वेष हमें प्रभावित कर सकता है।

पतंजलि योगसूत्र हमें इन प्रवृत्तियों को पहचानने और धीरे-धीरे उनसे अधिक स्वतंत्र होने की दिशा दिखाता है।

वैराग्य का अर्थ जीवन से भागना नहीं है।

यह जीवन के बीच रहते हुए भी अपनी मानसिक स्वतंत्रता बनाए रखने की दिशा है।

और शायद यही इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण बात है—

हमारी हर इच्छा पूरी होना जरूरी नहीं है; लेकिन अपनी इच्छाओं को समझना जरूरी है।

योगसूत्र संदर्भ

मुख्य संदर्भ: सूत्र 1.12–1.16, 2.3, 2.7–2.8, 2.32 और 2.42।
विषय के अनुसार संबंधित अन्य सूत्रों को आगे भी जोड़ा जाएगा।

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