क्या आधुनिक पुरस्कार-आधारित शिक्षा भ्रष्टाचार की मनोवैज्ञानिक जड़ है?
गुरुकुल से किंडरगार्टन तक: शिक्षा, संस्कार और भ्रष्टाचार पर एक वैचारिक विमर्श
भ्रष्टाचार पर वर्षों से चर्चा होती रही है। इसके कारणों में गरीबी, लालच, कमजोर कानून, राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रशासनिक शिथिलता, सामाजिक असमानता और नैतिक पतन जैसे अनेक कारण गिनाए जाते हैं। किंतु मेरा मानना है कि इन सबके पीछे एक ऐसा कारण भी हो सकता है, जिस पर अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं किया गया है—प्रारंभिक शिक्षा प्रणाली।
यह लेख किसी स्थापित निष्कर्ष का दावा नहीं करता। यह एक मौलिक वैचारिक परिकल्पना है, जिसे मैं शिक्षा-शास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों, दार्शनिकों और नीति-निर्माताओं के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
गुरुकुल की शिक्षा: कर्तव्य पहले, पुरस्कार बाद में
भारतीय गुरुकुल परंपरा का मूल उद्देश्य केवल पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं था। उसका लक्ष्य चरित्र निर्माण, आत्मसंयम, अनुशासन, सेवा, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यबोध का विकास था।
विद्यार्थी से अपेक्षा की जाती थी कि वह अध्ययन इसलिए करे क्योंकि ज्ञान उसका कर्तव्य है। अनुशासन भंग होने पर दंड मिल सकता था, किंतु शिक्षा का केंद्र कर्तव्य था, पुरस्कार नहीं।
गुरुकुल यह संदेश देता था कि सही कार्य इसलिए करो क्योंकि वह सही है।
आधुनिक किंडरगार्टन: पुरस्कार आधारित प्रेरणा
आधुनिक प्रारंभिक शिक्षा में अक्सर बच्चों को प्रेरित करने के लिए चॉकलेट, स्टार, स्माइली, स्टिकर, गिफ्ट, टॉफी या अन्य पुरस्कारों का उपयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए शिक्षक कहता है—
"A लिखोगे तो चॉकलेट मिलेगी।"
यह तरीका सीखने को रोचक बनाने के उद्देश्य से अपनाया जाता है। मैं उसके उद्देश्य पर प्रश्न नहीं उठा रहा हूँ। मेरा प्रश्न उसके दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर है।
यदि बच्चे का मस्तिष्क बार-बार यह सीखता है कि अच्छे कार्य के बदले कोई पुरस्कार अवश्य मिलेगा, तो क्या उसके अवचेतन में यह धारणा विकसित हो सकती है कि हर कार्य का कोई व्यक्तिगत प्रतिफल होना चाहिए?
मेरी शोध-परिकल्पना
यहीं से मेरा मौलिक विचार प्रारंभ होता है।
यदि बचपन में बार-बार यह मानसिक संरचना बनती है कि कार्य और पुरस्कार अविभाज्य हैं, तो क्या भविष्य में वही व्यक्ति यह सोच सकता है कि—
"यदि मुझे किसी फ़ाइल पर हस्ताक्षर करने हैं, तो मुझे भी कुछ मिलना चाहिए।"
स्पष्ट रूप से कहूँ तो मैं यह नहीं कह रहा कि चॉकलेट ही रिश्वत बन जाती है। मैं यह प्रश्न उठा रहा हूँ कि क्या पुरस्कार-आधारित सोच की निरंतर आदत व्यक्ति के मूल्य-निर्माण को प्रभावित कर सकती है?
यदि ऐसा है, तो भ्रष्टाचार की जड़ें केवल प्रशासनिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कारों में भी खोजी जानी चाहिए।
क्या भ्रष्टाचार बचपन से शुरू होता है?
सामान्यतः हम मानते हैं कि भ्रष्टाचार नौकरी मिलने के बाद शुरू होता है।
मेरा विचार इससे भिन्न है।
मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार का व्यवहार कार्यालय में दिखाई देता है, लेकिन उसकी मानसिक तैयारी बहुत पहले प्रारंभ हो सकती है। यदि बचपन से व्यक्ति का मन हर कार्य के बदले प्रतिफल की अपेक्षा करने लगे, तो अवसर मिलने पर वही प्रवृत्ति आर्थिक रूप भी ले सकती है।
यह एक मनोवैज्ञानिक संभावना है, जिस पर गंभीर अनुसंधान होना चाहिए।
गुरुकुल और आधुनिक शिक्षा का समन्वय
मैं आधुनिक शिक्षा का विरोध नहीं करता। न ही मैं पुरस्कारों को पूर्णतः समाप्त करने की बात करता हूँ।
मेरा विचार केवल इतना है कि शिक्षा का केंद्र पुरस्कार नहीं, चरित्र होना चाहिए।
यदि बच्चे को यह भी सिखाया जाए कि—
- कुछ कार्य केवल कर्तव्य के कारण किए जाते हैं।
- हर अच्छे कार्य का पुरस्कार धन नहीं होता।
- ईमानदारी स्वयं में एक मूल्य है।
- सेवा और उत्तरदायित्व जीवन के आधार हैं।
तो संभव है कि भविष्य का समाज अधिक नैतिक बने।
शोध की आवश्यकता
मैं इस विचार को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ। मैं इसे एक शोध-परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।
यदि शिक्षा-मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience), समाजशास्त्र और अपराधशास्त्र (Criminology) के विशेषज्ञ इस विषय पर दीर्घकालिक अध्ययन करें, तो संभव है कि भ्रष्टाचार की मनोवैज्ञानिक जड़ों के बारे में नए तथ्य सामने आएँ।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून आवश्यक हैं, लेकिन केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं।
यदि समाज को वास्तव में भ्रष्टाचार-मुक्त बनाना है, तो हमें यह प्रश्न पूछना होगा कि हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं—कर्तव्य या केवल पुरस्कार?
संभव है कि भ्रष्टाचार की लड़ाई अदालतों से पहले कक्षा में जीती या हारी जाती हो।
यह लेख एक मौलिक वैचारिक परिकल्पना है। इसका उद्देश्य किसी स्थापित शिक्षा-पद्धति का निषेध नहीं, बल्कि शिक्षा, मनोविज्ञान और नैतिक विकास के संबंध पर गंभीर बौद्धिक विमर्श को प्रेरित करना है।
— G. D. Pandey
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