पतंजलि योगसूत्र और आदतें
हम बार-बार वही काम क्यों करते हैं और अपनी आदतों को कैसे समझें?
हमारे जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा आदतों से चलता है।
कई बार हमें अपनी आदत का पता भी होता है, फिर भी उसे बदलना आसान नहीं होता।
हम कहते हैं—
“मैं जानता हूँ कि यह ठीक नहीं है, लेकिन फिर भी मुझसे यही हो जाता है।”
यहीं पतंजलि योगसूत्र का संस्कार और वृत्ति संबंधी विचार हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी हो जाता है।
लेकिन एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है—
पतंजलि योगसूत्र में आधुनिक अर्थ का “habit formation” अध्याय नहीं है।
इसलिए इस post में “आदत” शब्द को योगसूत्र के वृत्ति, संस्कार, अभ्यास और चित्त की प्रवृत्तियों से जोड़कर समझा जा रहा है; इसे योगसूत्र का शाब्दिक अनुवाद नहीं माना जाना चाहिए।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.5–1.14, 4.8–4.11)
आदत कैसे बनती हुई दिखाई दे सकती है?
मान लीजिए किसी व्यक्ति को किसी बात पर बार-बार गुस्सा आता है।
पहली बार गुस्सा आया।
उसने तुरंत जवाब दिया।
अगली बार वही परिस्थिति आई।
फिर गुस्सा आया।
फिर वही प्रतिक्रिया हुई।
धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देना सामान्य लगने लगा।
अब उसे सोचने की जरूरत भी नहीं पड़ती।
स्थिति आई और प्रतिक्रिया अपने आप निकल गई।
हम सामान्य भाषा में इसे आदत कह सकते हैं।
योगदर्शन की भाषा में इसे समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि बार-बार होने वाली मानसिक गतिविधियाँ और उनके संस्कार आगे की प्रवृत्तियों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
वृत्ति और संस्कार का संबंध
पतंजलि योगसूत्र के आरंभ में चित्तवृत्तियों की चर्चा की गई है।
मन में विभिन्न प्रकार की मानसिक गतिविधियाँ होती रहती हैं।
हम सोचते हैं।
याद करते हैं।
कल्पना करते हैं।
सही या गलत समझ बनाते हैं।
सोते हैं।
इन मानसिक गतिविधियों के लगातार दोहराव से मन पर प्रभाव पड़ सकता है।
आगे चलकर पतंजलि संस्कारों की चर्चा करते हैं।
इसलिए सरल भाषा में इसे इस प्रकार समझ सकते हैं—
बार-बार की मानसिक गतिविधि → मानसिक छाप → आगे की प्रवृत्ति
यह एक व्याख्यात्मक तरीका है; इसे योगसूत्र का शाब्दिक सूत्र नहीं मानना चाहिए।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.5–1.11 तथा 4.8–4.11)
हर आदत शरीर की नहीं होती
हम आदत कहते ही अक्सर बाहरी व्यवहार के बारे में सोचते हैं।
लेकिन मानसिक आदतें भी होती हैं।
कुछ लोग हर बात में समस्या खोजते हैं।
कुछ लोग हर परिस्थिति में पहले डरते हैं।
कुछ लोग हर बात को व्यक्तिगत अपमान समझ लेते हैं।
कुछ लोग किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले बहुत अधिक सोचते रहते हैं।
कुछ लोग दूसरों की स्वीकृति के बिना अपने निर्णय पर भरोसा नहीं कर पाते।
यह सब केवल बाहरी व्यवहार नहीं है।
यह हमारे सोचने और प्रतिक्रिया देने के तरीके से जुड़ा है।
इसलिए अपनी आदतों को बदलने के लिए केवल व्यवहार को देखना पर्याप्त नहीं।
हमें यह भी देखना होगा—
“मेरे मन में बार-बार कौन-सी वृत्ति उठती है?”
“मैं ऐसा ही हूँ” कहना कितना सही है?
किसी आदत के बारे में हम अक्सर कहते हैं—
“मेरा स्वभाव ही ऐसा है।”
लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है।
यदि कोई व्यक्ति वर्षों से जल्दी क्रोधित होता रहा है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि क्रोध करना उसकी स्थायी और अपरिवर्तनीय प्रकृति है।
हो सकता है कि बार-बार की प्रतिक्रियाओं से एक मजबूत प्रवृत्ति बन गई हो।
यदि ऐसा है, तो अभ्यास के द्वारा नई प्रतिक्रिया विकसित करने की संभावना भी हो सकती है।
यही बात योग की साधना को महत्वपूर्ण बनाती है।
पुरानी प्रवृत्ति होना और उसके अनुसार हमेशा व्यवहार करना—दो अलग बातें हैं।
अभ्यास क्यों महत्वपूर्ण है?
पतंजलि योगसूत्र में चित्त को स्थिर करने के लिए अभ्यास और वैराग्य को आधार बताया गया है।
अभ्यास का अर्थ है—
चित्त को स्थिर रखने के लिए बार-बार किया जाने वाला प्रयत्न।
यह केवल एक दिन का प्रयास नहीं है।
पतंजलि अभ्यास को दृढ़ बनाने के लिए लंबे समय तक, बिना रुकावट और श्रद्धा के साथ किए जाने की बात भी करते हैं।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12–1.14)
आदतों के संदर्भ में इसका व्यावहारिक अर्थ समझें—
यदि हम वर्षों से किसी विशेष तरीके से प्रतिक्रिया करते आए हैं, तो एक-दो बार अलग प्रतिक्रिया देने से पुरानी प्रवृत्ति तुरंत समाप्त नहीं होगी।
नई दिशा को भी बार-बार दोहराना पड़ेगा।
एक छोटी-सी आदत बदलने का उदाहरण
मान लीजिए आपकी आदत है कि कोई आलोचना करे तो आप तुरंत जवाब देते हैं।
पहला अभ्यास हो सकता है—
आलोचना सुनते ही तुरंत उत्तर न देना।
कुछ क्षण रुकना।
फिर सोचना—
“क्या इसमें वास्तव में कोई उपयोगी बात है?”
यदि है तो स्वीकार करना।
यदि नहीं है तो शांत तरीके से अपनी बात रखना।
पहली बार यह कठिन लगेगा।
दूसरी बार भी।
लेकिन यदि आप बार-बार ऐसा करते हैं, तो प्रतिक्रिया का नया तरीका मजबूत हो सकता है।
यह आधुनिक habit-training की भाषा में अलग तरह से समझाया जा सकता है; यहाँ इसे योगसूत्र के अभ्यास-सिद्धांत से जीवन में निकाला गया व्यावहारिक प्रयोग समझना चाहिए।
वैराग्य आदत बदलने में कहाँ आता है?
मान लीजिए आपको मोबाइल देखने की बहुत इच्छा होती है।
मन कहता है—
“बस एक बार देख लेता हूँ।”
फिर आप देखते हैं।
फिर कुछ और देखते हैं।
फिर समय निकल जाता है।
यहाँ केवल इच्छा को पहचानना पर्याप्त नहीं।
हमें यह भी सीखना होगा कि हर इच्छा पर तुरंत चलना आवश्यक नहीं है।
यही वैराग्य की व्यावहारिक दिशा से जुड़ सकता है।
मन में इच्छा आई।
हमने उसे देखा।
लेकिन तुरंत उसके पीछे नहीं गए।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.15–1.16)
इच्छा और आदत का संबंध
कई आदतों के पीछे कोई सुखद अनुभव हो सकता है।
मोबाइल देखने से मनोरंजन मिलता है।
प्रशंसा से अच्छा लगता है।
मीठा खाने से आनंद मिलता है।
गुस्सा करने से कुछ समय के लिए ऐसा महसूस हो सकता है कि हमने अपनी बात मनवा ली।
मन उस सुखद अनुभव को फिर चाहता है।
इस प्रकार सुखद अनुभव के प्रति तृष्णा और बार-बार की प्रतिक्रिया एक-दूसरे को मजबूत कर सकती हैं।
पतंजलि योगसूत्र में सुख के अनुभव से जुड़ी तृष्णा को राग कहा गया है।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.7)
इसलिए आदत को समझते समय यह देखना भी उपयोगी है—
“इस व्यवहार से मुझे क्या मिलता है?”
कुछ आदतें दुख से बचने के लिए भी बन सकती हैं
हर आदत सुख पाने के लिए नहीं होती।
कुछ व्यवहारों का उद्देश्य अप्रिय अनुभव से बचना हो सकता है।
उदाहरण के लिए—
किसी व्यक्ति को आलोचना का डर है।
वह लोगों के सामने अपनी राय रखना ही छोड़ देता है।
हर बार कठिन बातचीत से बचता है।
कुछ समय के लिए उसे राहत मिलती है।
लेकिन धीरे-धीरे बचने की आदत मजबूत हो सकती है।
यहाँ पतंजलि के द्वेष की अवधारणा को एक व्यापक संदर्भ के रूप में समझा जा सकता है।
अप्रिय अनुभव से दूर रहने की तीव्र प्रवृत्ति हमारे व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 2.8)
क्या हर आदत संस्कार है?
यह कहना सही नहीं होगा कि आधुनिक जीवन की हर आदत को सीधे “संस्कार” ही कहा जाए।
योगसूत्र में संस्कार एक व्यापक और गहरी दार्शनिक अवधारणा है।
इसलिए बेहतर समझ यह है—
आदत सामान्य जीवन की भाषा है।
संस्कार योगदर्शन की विशिष्ट अवधारणा है।
दोनों में संबंध समझा जा सकता है, लेकिन दोनों को पूरी तरह समान नहीं मानना चाहिए।
यह अंतर हमारी पूरी श्रृंखला में बनाए रखना जरूरी है।
पुरानी आदत बदलते समय सबसे बड़ी गलती
हम अक्सर सोचते हैं—
“आज से मैं यह आदत बिल्कुल नहीं करूँगा।”
फिर दो-तीन दिन प्रयास करते हैं।
पुरानी प्रतिक्रिया वापस आती है।
हम निराश हो जाते हैं।
और कहते हैं—
“मुझसे यह बदल ही नहीं सकता।”
यहाँ समस्या यह है कि हमने परिवर्तन को केवल इच्छा पर छोड़ दिया।
योग की दृष्टि में अभ्यास का अर्थ ही बार-बार प्रयास करना है।
मन भटका—
वापस लाएँ।
पुरानी प्रतिक्रिया आई—
उसे पहचानें।
गलती हुई—
फिर से अभ्यास करें।
यही निरंतरता महत्वपूर्ण है।
आदत बदलने से पहले उसे पहचानें
किसी आदत को बदलने का पहला कदम उसे स्पष्ट रूप से देखना हो सकता है।
उदाहरण—
मुझे कब गुस्सा आता है?
किस व्यक्ति के सामने?
किस प्रकार की बात पर?
उस समय मेरे मन में क्या विचार आता है?
मैं तुरंत क्या करता हूँ?
बाद में मुझे कैसा लगता है?
इस प्रकार हम पूरी प्रक्रिया को देख सकते हैं।
फिर हमें केवल “मैं गुस्सैल हूँ” जैसी पहचान नहीं बनानी पड़ेगी।
हम देख पाएँगे—
“यह परिस्थिति → यह विचार → यह प्रतिक्रिया”
और यहीं से परिवर्तन की संभावना बढ़ती है।
आदत और स्मृति
कई आदतों के पीछे पुरानी स्मृतियाँ भी काम कर सकती हैं।
किसी पुराने अनुभव में हमें चोट लगी।
अब समान परिस्थिति आते ही वही पुरानी प्रतिक्रिया सक्रिय हो जाती है।
इसलिए कभी-कभी हम वर्तमान व्यक्ति से नहीं, बल्कि वर्तमान परिस्थिति में सक्रिय हुई पुरानी स्मृति और संस्कार से प्रतिक्रिया कर रहे होते हैं।
पतंजलि स्मृति को भी चित्त की वृत्ति के रूप में बताते हैं।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.11)
इसलिए अपने व्यवहार को समझते समय यह देखना उपयोगी है कि—
“क्या मेरी वर्तमान प्रतिक्रिया के पीछे अतीत की कोई छाप सक्रिय है?”
क्या ध्यान से आदतें बदल सकती हैं?
ध्यान को केवल किसी आदत को जादुई तरीके से समाप्त करने का साधन मानना उचित नहीं है।
लेकिन योगसूत्र की दृष्टि से चित्त को देखना, स्थिर करना और उसकी गतिविधियों को पहचानना साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब हम अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं को देखने लगते हैं, तो उनके बीच थोड़ा अंतर पैदा हो सकता है।
विचार आया।
लेकिन हमने तुरंत उसका पालन नहीं किया।
क्रोध आया।
लेकिन हमने तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी।
इच्छा आई।
लेकिन हमने तुरंत उसे पूरा नहीं किया।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है।
आदत बदलने में “रुकना” क्यों महत्वपूर्ण है?
आदत का सबसे मजबूत हिस्सा अक्सर यही होता है कि प्रतिक्रिया बहुत जल्दी होती है।
इसलिए यदि हम विचार और प्रतिक्रिया के बीच थोड़ी जागरूकता ला सकें, तो हमारे पास चुनाव की संभावना बढ़ सकती है।
उदाहरण—
किसी ने कुछ कहा → गुस्सा → तुरंत जवाब।
इसके बजाय—
किसी ने कुछ कहा → गुस्सा आया → मैंने गुस्सा पहचाना → कुछ क्षण रुका → फिर उत्तर दिया।
घटना वही है।
लेकिन बीच में एक नया चरण जुड़ गया—
जागरूकता।
यही अभ्यास धीरे-धीरे महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या पुरानी प्रवृत्ति हमेशा लौट सकती है?
हाँ, ऐसा हो सकता है।
इसलिए एक-दो बार सफल होने के बाद यह मान लेना उचित नहीं कि आदत पूरी तरह समाप्त हो गई।
पुरानी परिस्थिति आने पर पुरानी प्रतिक्रिया फिर सक्रिय हो सकती है।
ऐसे समय निराश होने के बजाय उसे पहचानना चाहिए।
“देखिए, पुरानी प्रवृत्ति फिर सामने आई।”
फिर अभ्यास की ओर लौटना चाहिए।
योगसूत्र का अभ्यास एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.13–1.14)
अच्छी आदतों का क्या?
यदि हम आदतों की चर्चा कर रहे हैं, तो केवल बुरी आदतों की बात करना अधूरा होगा।
नियमित अध्ययन।
नियमित ध्यान।
सत्य बोलने की आदत।
संयमित व्यवहार।
दूसरों के प्रति मैत्री।
अपने मन को देखने की आदत।
गलती स्वीकार करने की आदत।
ये सभी ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित कर सकती हैं जो हमारे जीवन को अधिक व्यवस्थित और शांत बना सकती हैं।
पतंजलि योगसूत्र में अभ्यास, यम, नियम, ध्यान और चित्त-प्रसादन जैसी शिक्षाएँ इसी व्यापक साधना की दिशा देती हैं।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.12–1.33, 2.29–2.32)
लेकिन योग की अंतिम दिशा केवल अच्छी आदतें बनाना नहीं है
यह बात बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि हम केवल इतना समझें कि—
“योग हमें अच्छी आदतें सिखाता है।”
तो योगसूत्र का वास्तविक उद्देश्य बहुत छोटा हो जाएगा।
अच्छी प्रवृत्तियाँ साधना में सहायता कर सकती हैं।
लेकिन योग का अंतिम लक्ष्य है—
चित्त की वृत्तियों से स्वतंत्र होना और द्रष्टा के वास्तविक स्वरूप में स्थित होना।
इसीलिए आगे चलकर पतंजलि संस्कारों, वृत्तियों और उनके क्षय की चर्चा करते हैं।
(पतंजलि योगसूत्र, सूत्र 1.2–1.4, 4.7–4.11)
अपनी आदतों को देखने का एक सरल तरीका
अगले कुछ दिनों तक केवल एक आदत को देखें।
उसे बदलने की जल्दी न करें।
बस ध्यान दें—
कब होती है?
किस परिस्थिति में होती है?
उससे पहले मन में क्या विचार आता है?
उसके बाद कैसा महसूस होता है?
क्या मुझे उससे कोई तत्काल सुख या राहत मिलती है?
क्या बाद में कोई नुकसान भी होता है?
इस प्रकार हम अपनी आदत को बाहर से नहीं, मन की पूरी प्रक्रिया के रूप में देखना शुरू कर सकते हैं।
हमारे जीवन के लिए मुख्य बात
हमारी हर आदत हमारी स्थायी पहचान नहीं है।
कई आदतें बार-बार की गई प्रतिक्रियाओं से मजबूत होती हैं।
उनके पीछे इच्छाएँ हो सकती हैं।
भय हो सकता है।
द्वेष हो सकता है।
पुरानी स्मृतियाँ हो सकती हैं।
और गहरे स्तर पर संस्कार भी भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन यदि मन में पुरानी प्रवृत्ति बनी है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम उसके अनुसार हमेशा व्यवहार करने के लिए मजबूर हैं।
अभ्यास हमें नई दिशा में बार-बार लौटना सिखाता है।
वैराग्य हमें हर इच्छा और आकर्षण के पीछे तुरंत भागने से रोकने की दिशा देता है।
और जागरूकता हमें अपनी प्रतिक्रिया और अपने बीच थोड़ा अंतर देखने देती है।
इसलिए अगली बार जब आप कहें—
“मैं ऐसा ही हूँ।”
तो एक क्षण रुककर पूछें—
“क्या मैं वास्तव में ऐसा ही हूँ, या मैंने लंबे समय तक ऐसा व्यवहार करते-करते यह प्रवृत्ति बना ली है?”
यह प्रश्न आदत को बदलने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।
योगसूत्र संदर्भ
मुख्य संदर्भ: सूत्र 1.2–1.16, 1.30–1.33, 2.3, 2.7–2.8, 2.29–2.32 तथा 4.8–4.11।
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