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12/26/25
क्या स्त्री आज भी अन्नपूर्णा और गृहलक्ष्मी है?
12/20/25
भिखारी मुक्त भारत अभियान : जीवन संकल्प केंद्र — भिक्षा से आत्मनिर्भरता तक
भारत में भिक्षावृत्ति अब केवल गरीबी की समस्या नहीं रह गई है। यह मानसिक बीमारी, शारीरिक अक्षमता, सामाजिक बहिष्कार, मानव तस्करी, बच्चों के शोषण और संगठित गिरोहों से जुड़ा एक जटिल सामाजिक संकट बन चुकी है। ऐसे में भिक्षावृत्ति को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानकर समाप्त नहीं किया जा सकता। आवश्यकता है एक ऐसे मानवीय और व्यावहारिक समाधान की, जो भिखारी को समस्या नहीं, बल्कि समाज की जिम्मेदारी माने।“जीवन संकल्प केंद्र” इसी दृष्टि से प्रस्तावित एक राष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य भिक्षावृत्ति को हटाना नहीं, बल्कि भिखारी को सम्मानपूर्वक जीवन की मुख्यधारा में लौटाना है।
12/2/25
करुणा का दीप: हरकचंद सावला की कहानी
करुणा का दीप: हरकचंद सावला की कहानी
मुंबई की सड़कों पर उस दिन बारिश थमी ही थी।
टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ भले सूखने लगे थे,
पर वहाँ बैठे लोगों के चेहरे अब भी किसी अंतहीन तूफ़ान में भीगे लग रहे थे।
करीब तीस वर्ष का एक युवक अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठे उन मरीजों को निहार रहा था—
वे मरीज, जिनके चेहरे पर दर्द की झुर्रियाँ और विवशता की लकीरें ऐसे गुथी थीं
मानो जीवन ने उन्हें अपने चरम क्रूर रूप से रुबरु करा दिया हो।
उनके साथ आए परिजन,
थके-हारे, डरे-सहमे,
कभी अस्पताल के बड़े दरवाज़े को देखते,
कभी आसमान की ओर नजर उठाते,
जैसे उम्मीद का एक छोटा-सा तिनका भी उन्हें संभाल लेगा।
अधिकांश लोग दूर-दराज़ के गांवों से आए थे।
न रहने की जगह, न भोजन का भरोसा।
दवा की कीमतें उनके लिए पहाड़ थीं,
और बीमारी—वह पहाड़ जिसे वे बिना रस्सी, बिना साधन,
सिर्फ उम्मीद के सहारे चढ़ रहे थे।
यह दृश्य उस युवक की आत्मा को झकझोर गया।
वह भारी मन से घर लौटा,
पर मन जैसे वहाँ से वापस आया ही नहीं।
रात की खामोशी में भी उसे
उन्हीं चेहरों की पीड़ा सुनाई देती रही।
सोच उन्हीं की घूमती रही—
“क्या मैं इन लोगों के लिए कुछ कर सकता हूँ?”
यह प्रश्न धीरे-धीरे उसके भीतर संकल्प बनकर जड़ पकड़ने लगा।
कई दिनों की बेचैनी के बाद उसे रास्ता दिखा।
अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा निकालकर उसने
अस्पताल के निकट एक छोटा-सा भवन लिया
और एक शांत, किन्तु विशाल कार्य की नींव रख दी—
जरूरतमंदों के लिए मुफ्त भोजन की सेवा।
शुरू में यह कार्य एक छोटी लौ की तरह था।
कुछ ही लोग भोजन लेने आते,
कुछ ही हाथ सहायता के लिए आगे बढ़ते।
पर प्रेम और करुणा का काम कब छोटा रहा है?
धीरे-धीरे लौ तेज हुई, और रोशनी फैलती गई।
दिन, महीने, वर्ष बीतते गए।
बारिश, गर्मी, सर्दी—
मौसम बदलते रहे,
पर उस सेवा की थाली कभी खाली नहीं हुई।
जिस युवक ने यह कार्य शुरू किया था,
आज वही मानवता की मिसाल बन चुका है—
हरकचंद सावला।
भोजन सेवा के बाद उन्होंने देखा कि कई मरीज दवा खरीदने में असमर्थ हैं।
और तब उन्होंने शुरू किया—
मेडिसिन बैंक,
जहाँ डॉक्टर और फार्मासिस्ट स्वेच्छा से सेवा देने लगे।
कैंसर से जूझते बच्चों की आँखों से मासूम चमक न खो जाए,
इसके लिए उन्होंने टॉय बैंक भी बनाया—
एक छोटी-सी मुस्कान देने का प्रयास,
जो शायद किसी बच्चे को दर्द भुला दे।
धीरे-धीरे सावला के नेतृत्व में
जीवन ज्योत कैंसर रिलीफ एंड केयर ट्रस्ट
मानवीयता की एक विस्तृत छतरी बन गया—
भोजन, दवा सहायता, रक्त सहयोग,
काउंसलिंग और आर्थिक सहायता जैसे अनेक कार्यों के साथ।
सत्तर की दहलीज पार करने के बावजूद
हरकचंद सावला का उत्साह आज भी वैसा ही है
जैसा उस पहले दिन था,
जब उन्होंने अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठे मरीजों को देखा था।
पुरस्कार, पहचान, प्रसिद्धि—
उनकी यात्रा में ये सब कभी लक्ष्य नहीं रहे।
उन्होंने हमेशा कहा—
“सच्ची सेवा वह है, जिसे करने वाला खुद भूल जाए,
पर जिसका असर दुनिया याद रखे।”
आज जब हम समाज के चमकते चेहरों की ओर देखते हैं,
तो यह भी याद रखना चाहिए कि
असल रोशनी अक्सर उन लोगों के भीतर छिपी होती है
जो बिना शोर किए,
बिना मंचों की रोशनी के,
किसी अजनबी के जीवन में आशा का दीप जलाते हैं।
हरकचंद सावला उसी दीप का नाम है—
जो अब भी टिमटिमाता नहीं,
बल्कि स्थिर, अडिग और उज्ज्वल होकर
हजारों जीवनों को रोशन कर रहा है।
7/4/25
अल्बर्ट आइंस्टाइन | 4 साल तक नहीं बोले दुनिया के Genius! विज्ञान, प्यार और पछतावे की अनसुनी दास्तान
6/30/25
पति-पत्नी और ‘वो’: Lessons from Ramayana’s Manthara for Stronger Relationships
पति, पत्नी और ‘वो’: रामायण की मंथरा से सीख – एक प्रेरक दृष्टिकोण
प्रस्तावना
मनुष्य का जीवन संबंधों का जाल है – पति, पत्नी, परिवार, मित्र, समाज। हर रिश्ता मधुरता भी ला सकता है और कलह भी। अक्सर कहा जाता है कि विवाह दो आत्माओं का पवित्र बंधन है। लेकिन कभी-कभी इस बंधन के बीच कोई तीसरा आ जाता है – ‘वो’ – और सब कुछ बिगड़ जाता है।
यह ‘वो’ केवल कोई व्यक्ति नहीं होता; यह लालच, शक, अहंकार, ईर्ष्या, या बाहरी दखल भी हो सकता है। यह लेख रामायण में मंथरा जैसे चरित्र से सीख लेने का एक प्रेरक प्रयास है—कैसे एक छोटा विचार भी पूरे परिवार को तूड़ सकता है, और हम अपने जीवन में इसे कैसे रोकें।
मंथरा – एक प्रतीक
रामायण में मंथरा कोई साम्राज्य की महारानी नहीं थी; वह बस एक दासी थी, पर उसने राजमहल को हिला दिया। यह हमें बताता है कि कभी-कभी बड़ी त्रासदी का कारण कोई बड़ा कारण नहीं, बल्कि कोई छोटी ईर्ष्या या अफ़वाह होती है।
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मंथरा की चालाकी: मीठी बातों से कैकयी का मन जीतना
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ख़तरे का स्वरूप: राम के राजतिलक की खबर को संकट की तरह पेश करना
“राज्य तो भरत का था – राम छीन रहा है।”
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नतीजा: कैकयी का मन भय, लालच और असुरक्षा से भर जाना
असल में मंथरा का कम दोष था; असली दोष कैकयी के अडिग विश्वासहीन होने में था।
‘वो’ कौन है – पति-पत्नी के बीच तीसरा कौन?
‘वो’ कई रूपों में आ सकता है:
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कोई तीसरा व्यक्ति – प्रेम संबंध में दखल
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कोई सलाहकार – जो बुरे विचार डाले
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शक – जिसे आधार न हो, पर रिश्ता जला दे
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अहंकार – जो संवाद खत्म कर दे
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पैसा – जो लालच और स्वार्थ पैदा करे
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परिवार/समाज का दबाव – जो प्यार के रास्ते में बाधा बने
ध्यान दें: मंथरा जैसी भूमिका कोई भी निभा सकता है, भले उसकी मंशा बुरी न हो—यहाँ तक कि माँ‑बाप, भाई‑बहन भी।
वे केवल अपने बच्चे के दृष्टिकोण से सोचते हैं।
वे ससुराल पक्ष की परिस्थितियाँ नहीं जान पाते।
वे अनजाने में पक्षपात कर देते हैं।
उनका अनुभव हर घर पर लागू नहीं होता।
रामायण में मंथरा ने कैकयी को दशरथ के विरुद्ध खड़ा कर दिया; आज भी ‘वो’ आकर पति-पत्नी को एक-दूसरे के विरुद्ध कर देता है।
पहले कुछ आधुनिक उदाहरण
उदाहरण 1: शक
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परिस्थिति: रमेश का प्रमोशन, देर तक ऑफिस में रुकना
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घटना: कविता ने “Good night 😊” मैसेज देखा और शक कर लिया
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‘मंथरा’: शक
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परिणाम: आरोप-प्रत्यारोप, दूरी
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सीख: कभी भी ‘शक’ की आग लगने से पहले संवाद करें।
उदाहरण 2: दोस्त की सलाह
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परिस्थिति: रीना की सहेली ने कहा, “तेरा पति तो तुझे कंट्रोल करता है”
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परिणाम: झगड़े शुरू, प्यार की जगह तकरार
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सीख: हर सलाह सही नहीं होती; सोच‑समझकर अपनाएं।
उदाहरण 3: लालच
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परिस्थिति: राहुल विदेश नौकरी, पत्नी ने कहा “मम्मी‑पापा को छोड़ दो”
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परिणाम: माता‑पिता बीमार, परिवार टूट गया
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सीख: लालच रिश्ते तोड़ देता है।
अपने घर के लोग भी ‘मंथरा’ बन सकते हैं
उदाहरण 4: माता‑पिता की अति‑चिंता
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रीमा का दुख: पति राजेश से कम बात होना
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माँ की सलाह: “तू झेल मत, साफ बोल दे—तू नौकरानी नहीं!”
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परिणाम: झगड़े, ससुराल में तनाव, बेइज्जती का एहसास
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सीख: सलाह देने से पहले बेटी के पति व परिवार की भावनाएँ सोचें।
उदाहरण 5: भाई की सलाह
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परिस्थिति: अर्पिता ‘सबकी सेवा’ कर रही थी
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भाई ने कहा: “बोल दे, मम्मी‑पापा अलग रहें”
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परिणाम: पति पर दबाव, परिवार बिखर गया
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सीख: हर घर का संस्कार, परिस्थिति अलग होती है।
उदाहरण 6: माता‑पिता की तुलना
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नीरज के घर: माँ बोली, “बहू हमारे हिसाब से नहीं चलती”
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भाभी के घर: “हमारी बेटी क्यों झुके?”
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परिणाम: आपस में लड़ाई, नफरत
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सीख: दोनों परिवारों का पक्ष लेकर रिश्ते को ज़हर न दें।
उदाहरण 7: पिता की आर्थिक सलाह
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सलाह: “अलग रहो, संयुक्त परिवार क्यों?”
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परिणाम: पति-पत्नी अलगाव, ससुराल नाराज़
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सीख: नियत भले अच्छी हो, पर बिना सोच के निर्णय रिश्ते में खटास लाता है।
उदाहरण 8: बहन की भावुक सलाह
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सलाह: “अमित को काबू करना, मस्तीखोर है”
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परिणाम: भाभी ने शक से सब देखा, विश्वास टूटा
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सीख: अपनों की “सावधानियों” से रिश्ते में दरार आ सकती है।
मंथरा की असली पहचान
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मीठी बातें, “मैं तुम्हारा भला चाहती हूँ।”
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अपनों जैसी सलाह, इसलिए असरदार।
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पर नतीजा: भरोसे में जहर, रिश्तों में दरार, पछतावा।
दस वाक्य जो अपनों की सलाह ‘मंथरा’ बना देते हैं
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“तू क्यों सब सहती है?”
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“अलग हो जा, क्यों संयुक्त परिवार में रहना?”
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“तुझे क्यों सबके हिसाब से चलना?”
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“तेरी झुकने से वे चढ़ते हैं।”
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“देख उसकी माँ कैसी है।”
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“अपने पति को कंट्रोल कर।”
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“तेरा ससुराल तुझे दबा रहा है।”
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“हमारा घर देख—यहाँ ऐसा नहीं होता।”
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“तुझे उनकी सुनने की जरूरत नहीं।”
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“तेरा पति बदल गया है—ध्यान रखना।”
क्यों अपनों की सलाह इतनी असरदार होती है?
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वे हमारी कमजोरियाँ जानते हैं।
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हम उन पर सबसे अधिक भरोसा करते हैं।
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उनकी मंशा 100% प्यार और सुरक्षा की होती है।
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पर उनके अनुभव हर घर पर लागू नहीं होते।
‘मंथरा’ से बचने के उपाय
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सुनें, पर तुरंत लागू न करें।
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सोचें—क्या यह सलाह हमारे रिश्ते के लिए सही है?
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जीवनसाथी से खुलकर बात करें।
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परिस्थिति के हिसाब से निर्णय लें।
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अपनों से विनम्रता से कहें—“हमें भी निर्णय लेने दें।”
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सलाह छुपाकर न रखें—साझा करें।
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रिश्ते की जिम्मेदारी खुद उठाएँ।
माता‑पिता व भाई‑बहन के लिए अपील
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आपका बच्चा अब अकेला नहीं; उसका जीवनसाथी भी है।
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सलाह देते समय दोनों की भलाई सोचें।
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अनुभव बाँटें, पर दबाव न डालें।
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“अब आपका बच्चा किसी और का भी है—उसे साझा समझें।”
प्रेरक कहानियाँ
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पचास वर्षों का दम्पति अनुभव:
“हमारे समय में चीजें टूटती थीं तो हम उन्हें फेंकते नहीं थे—जोड़ते थे।”
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विदाई पर माँ की सीख:
“बेटी, झगड़ा हो तो हमें बताना, पर पहले तुम दोनों आपस में सुलझा लो।”
आदर्श पति/पत्नी – 21वीं सदी
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सुनने वाला • समझने वाला • भरोसेमंद • धैर्यवान
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प्रेरक • ईमानदार • जिम्मेदार • सहनशील • सकारात्मक
‘वो’ को हराने का मंत्र
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खुलकर संवाद
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प्रेम और सम्मान
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भरोसा और धैर्य
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सीमाएँ तय करना
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गलतफहमियाँ दूर करना
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रिश्ते को प्राथमिकता देना
अंतिम प्रेरक पंक्तियाँ
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“रिश्ते सलाह से नहीं, समझ से चलते हैं।”
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“जोड़े वही मजबूत होते हैं, जो हर सलाह को सोचकर अपनाते हैं।”
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“अपनों की सलाह अमृत भी हो सकती है—बिना विवेक के वह विष भी बन सकती है।”
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“मंथरा को दोष मत दो—कैकयी बनने से खुद को बचाओ।”
समापन संकल्प
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हम अपने रिश्ते को मंथरा के असर से बचाएंगे।
-
हम विश्वास की नींव पर अपना घर बनाएंगे।
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हम प्रेम, संवाद और सम्मान को अपना मूल मंत्र बनाएंगे।
जय श्री राम!
6/22/25
चाणक्य नीति भाग 10 - न्याय, दंड और अपराध पर चाणक्य की कठोर नीति
हम लेकर आए हैं:
अंतिम भाग – भाग 10
जिसमें जानेंगे:
👉 चाणक्य का दृष्टिकोण –
न्याय, दंड और अपराध को लेकर कितना कठोर था,
और क्यों वह आज भी प्रशासकों के लिए आदर्श माना जाता है।
⚖️ चाणक्य का न्याय-दर्शन (H2)
“राजा का पहला धर्म है – न्याय।”
🎯 चाणक्य मानते थे कि:
